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कहानी

हथियार
चित्रा मुद्गल


अब भी उनकी निगाह मेन्यू से लिपटी हुई है।

उसकी आँखें उनकी ऊपर-नीचे टोहती, सरकती नजर को छूकर अनमनी-सी इधर-उधर उचकती, अपनी बढ़ती ऊब को नियंत्रित नहीं कर पा रही हैं।

बूढ़े होने को आए, जाने इतना समय क्यों लगाते हैं चीजें चुनने में कि उनके स्वाद की ललक ही क्षीण हो जाए? मेन्यू में दर्ज खाद्य वस्तुओं की सूची इतनी लंबी-चौड़ी भी नहीं कि चुनने में भ्रम की स्थिति गह ले! जानते हैं वह और खूब अच्छी तरह से जानते हैं, कितनी मुश्किल से वह उनका साथ पाने के लिए अपने गहरे गुँथे समय में से कुछ समय झटक पाती है। सुबह नींद टूटते ही वह सोचना शुरू कर देती है - आज उसे क्या कुछ निबटाना है और साँझ को उनसे कैसे मिलना है। बीच में कई-कई रोज समय न हथिया पाने के चलते उनसे मिलना संभव नहीं हो पाता। फोन पर बातें करके ही संतुष्ट हो लेना पड़ता है। फोन पर बतियाकर उन्हें संतुष्टि नहीं होती। उन्हें उसकी नौकरी पर खीझ होने लगती है। काम निबटाकर वह क्यों नहीं अपने बॉस से कह पाती कि उसे उनसे मिलने पहुँचना है? कौन-सा कानून उसे मिलने से रोक सकता है? जाने कैसा दफ्तर है उसका! उनके दफ्तर में तो लड़कियाँ रजिस्टर साइन करने के बाद दिखतीं ही नहीं।

बातें सुनते-सुनते वह उनका ध्यान दूसरी ओर मोड़ना चाहती है - उनके जुकाम का मुद्दा उठाकर या उनके साइटिका पेन का हाल पूछ कर। नई किताब कौन-सी पढ़ रहे हैं वे?

'क्या करूँ जुकाम के लिए? 'उसके आड़े हाथों लेते ही वे समर्पण की मुद्रा की ओट हो लेते हैं।

वह सयानों-सी समझाने लगती है। केमिस्ट की दुकान से फौरन विटामिन-सी की गोलियाँ मँगवाएँ। सिर पर तौलिया डालकर सुबह-शाम भाप लें। उनकी आवाज से लग रहा है, उन्हें हरारत है।

उनका जवाब उसे तनिक आश्वस्त कर देता है। उसे अधिक चिंतित होने की जरूरत नहीं। बुखार लगता जरूर है कि उन्हें, मगर थर्मामीटर उनके इस लगने को सिरे से झुठला देता है। कितने अकेले हैं! वह भी इस उम्र में।

जहाँ तक उसे याद है, छह महीने-भर शेष हैं उनके अवकाश प्राप्त करने में। एकाध वर्ष का एक्सटेंशन मिल सकता है उन्हें। एक्सटेंशन पाने के लिए वह विशेष जुगाड़ करने के पक्षधर नहीं हैं। अपने आप मिल जाए तो उन्हें काम करने में कोई आपत्ति भी नहीं। उन्हें पूरी उम्मीद है कि उनके काम की संजीदगी पहचानी जाएगी।

वैसे आज भी उनसे मिलना मुश्किल ही था।

उसकी मेज पर से निबटी फाइलें उठाकर ले जाने आए चपरासी मांदले ने सहसा ही उसे सुखद सूचना दी, 'कपूर साहब लंच के बाद ही चले गए, मैडम! साढ़े चार की उनकी फ्लाइट थी। कोलकाता गए। परसों लौटेंगे, यानी शेष फाइलें वह कल निबटा सकती है। प्रसन्नता की उमड़न दबाते हुए उसने मांदले से जानना चाहा था - अचानक कपूर साहब कोलकाता क्यों चले गए? मांदले रहस्यमयी हँसी हँसा था - उनकी बीवी ने उनके ऊपर तलाक का मुकदमा ठोक रखा है और कल उसकी सुनवाई की तारीख है। बीवी कपूर साहब के साथ रहना नहीं चाहती। बोलती है कि कपूर साहब मर्द नहीं हैं।

उसकी प्रसन्नता काफूर हो गई। मांदले से पूछना चाहती थी, 'कपूर साहब के बच्चे हैं ?'

उनका फोन नंबर मुँह जबानी याद है उसे। सहसा उँगलियाँ नंबर डायल करने लगीं।

संयोग से फोन उन्होंने ही उठाया। उसने उन्हें बताया कि वह चार के करीब दफ्तर छोड़ सकती है। आजाद मैदान क्रॉस कर वह चार बीस तक चर्च गेट 'गेलार्ड' पहुँच जाएगी। उनका क्या कार्यक्रम है?

'सक्सेना के पितियाउत बड़े भाई को हृदयाघात हुआ है आज सुबह। सक्सेना छुट्टी लेकर उन्हें देखने बांबे हॉस्पिटल गया हुआ है। उसका काम भी जिम्मे आ पड़ा है।'

'ठीक है' निचला होंठ ऊपरी दंतपंक्ति के नीचे आ दबा।

'दुखी मत होओ। अच्छा सुनो, तुम पहुँचो गेलार्ड। अपना और श्रीवास्तव का काम पाठक के जिम्मे टिकाकर पहुँचता हूँ चार बीस तक।'

उसे उनकी यही विशेषता भाती है। उसके आग्रह को वे टाल नहीं पाते। काम बहुत महत्वपूर्ण है उनके लिए मगर उससे अधिक नहीं।

सबसे अच्छी बात जो उनकी उसे लगती है, वह है - माँ के विषय में वह उससे कभी कुछ नहीं जानना चाहते हैं। जितना समय वह उसके संग व्यतीत करते हैं, उसके बचपन के दिनों में टहलते रहते हैं। दूसरी शादी क्यों नहीं की उन्होंने? शादी वह करे, जिसे अकेलापन काटे। उस घर में रहते प्रतिपल वह उनके पास बनी रहती है। घर के प्रत्येक कोने में उसकी तस्वीरें सजी हुई हैं। घर की कड़ी खोलते ही वह किसी भी तस्वीर से बाहर छलाँग लगा, उनके स्वागत में दौड़कर उनकी टाँगों से लिपट जाती है, 'दिखाइए, मेरे लिए क्या लाए हैं?' जेब से उसकी पसंद की चॉकलेट निकालकर वह बैठक में रखे डिवाइडर पर रखी चॉकलेट खाती उसकी तस्वीर के सामने रख देते हैं। चॉकलेट इकट्ठी होती रहती है। मिलने पर इकट्ठी चॉकलेट वे उसे थमा देते हैं। उनके सामने ही वह चॉकलेट के रैपर हटाकर एक के बाद एक खाना शुरू कर देती है और खाते-खाते हँसी से दोहरी होती हुई उस किस्से पर चमत्कृत हो उठती है, जिसे सुनाते हुए वह बताते हैं कि पिछली रात उन्होंने उसके साथ घर की बैठक में जमकर क्रिकेट खेली। बॉलिंग वह इतनी जोरदार करती है कि उसकी गेंद से रसोई की दो खिड़कियों के शीशे चटख गए। ट्रे में रखी कॉन्टेसा रम की भरी बोतल उलट गई।

जब तक वह रसोई से काँच की किरचें बुहारते, कूदकर वह अपने कद से बड़ा क्रिकेट का बल्ला सँभाले उसी तस्वीर में जा छिपी, जो उनके बिस्तर की साइड टेबल पर सुनहरे फ्रेम में जड़ी रखी हुई है। दुष्ट डर गई थी। कहीं माँ से उसे डाँट न पड़ जाए कि तुम इतनी आक्रामक गेंदबाजी क्यों करती हो भला?

अब बताए, वह अकेले कहाँ हैं?

उनसे मिलकर घर देरी से पहुँचने पर उसका एक ही बहाना होता है - जाने क्यों, अंबरनाथ लोकल अचानक रद्द कर दी गई।

लोकल गाड़ियों का बहाना खासा कारगर बहाना है और विलंब से पहुँचने वालों के लिए अचूक रक्षाकवच।

सौतेले पिता, डाबीवली के एक छोटे-से जूता कारखाने में मामूली अधिकारी हैं, जिनकी घर में उपस्थिति घर को चमड़े की असहनीय बू से भर देती है। शायद घर को उस बू से बचाने के लिए ही माँ रसोई में टँगे छोटे-से मंदिर के अगरबत्ती स्टैंड की अगरबत्तियों को कभी बुझने नहीं देती। अक्सर घर देरी से लौटने पर सौतेले पिता भी वही बहाना गढ़ते हैं, जो बहाना वह गढ़ती है। उसे विस्मय इस बात पर होता है कि माँ उसके बहाने पर कभी उग्र नहीं होतीं, जबकि सौतेले पिता का बहाना उन्हें बहाना लगता है।

माँ के सिटकनी-चढ़े बंद कमरे में आती उनकी सिसकियाँ उसे उदास करती हैं।

दीवारों को भेदने वाले उनके आर्त बोल भी, कि कारखाने में किसी स्त्री के साथ चल रही प्रेमपींगों के चलते ही वे घर विलंब से लौटते हैं। लोकल ट्रेन उनकी सुविधानुसार रद्द होती रहती है। सब समझ रही हैं वे। पछता रही हैं। जाने क्यों, उन जैसे रँडुवे के प्रेम के झाँसे में आकर वे पसीज उठीं और अपनी बसी-बसाई गृहस्थी उजाड़ ली जबकि पहली पत्नी की ताई (दीदी) ने उन्हें फोन करके सतर्क किया था - सुनीता की मृत्यु दुर्घटना नहीं थी, आत्मदाह था।

'चीज पकौड़ों के साथ कसाटा आइसक्रीम खाओगी तुम?'

'इतनी देर में यही चुन पाए आप?' वह खीझ दबा नहीं पाई।

'कसाटा तो तुम्हें बचपन से पसंद है।'

'बचपन पीछे छूट चुका।'

'तुम्हारा नहीं।' उनका स्वर संजीदा हो गया।

'पसंद बदल नहीं सकती?'

'बदल गई होती तो मैं फिर कुछ और चुनता तुम्हारी नई पसंद।' उन्होंने संकेत से बेयरे को पास बुलाया।

'किस बात से ऐसा लगता है आपको?'

'बैठते ही तुम मेन्यू मेरी ओर सरकार देती हो हमेशा, तुम्हें यकीन है, खाने की जो भी चीजें मैं चुनूँगा, तुम्हारी पसंद की होंगी।'

उसे हँसी आ गई। मेज पर मोतिया बिछ गया।

उनकी तुनक कम नहीं हुई, 'अगर यह सच नहीं है तो मेन्यू स्वयं देख लिया करो।'

हँसी रुक नहीं रही थी। उन्हें तुनकाने में उसे मजा आ रहा था, 'अब ऑर्डर भी दीजिए। लिखवाइए बेयरे को।'

ऑर्डर लिखवाने के उपरांत वे मुड़े उसकी ओर, 'हँसी क्यों तुम?'

'मजाक नहीं उड़ा रही मैं आपका।'

'फिर क्या उड़ा रही हो?'

'हँसी इसलिए आ गई कि मैं फिजूल आपसे उलझ रही हूँ। सच यही है, मैं चाहती हूँ मैं वही खाऊँ, जो आप मेरे लिए चुनें। यह भी जानती हूँ, आप इतना वक्त इसीलिए लगाते हैं क्योंकि मेरी पसंद की दस-पंद्रह चीजें गड्डमड्ड होने लगती हैं आपके सामने और आप सोचने लगते हैं, पिछली बार जो कुछ खा चुकी हूँ, इस बार उसे दोहराया न जाए। क्या मैं गलत हूँ?'

उनके चेहरे पर गहरा उच्छ्वास सँवला आया, 'नहीं! लेकिन उसने कभी तुम्हारी तरह नहीं सोचा...'

'जरूरी नहीं था कि सभी एक तरह से सोचें?' यह अचानक माँ बीच में कहाँ से आ गई, जो कभी नहीं आती।

वे लगभग उखड़ आए - 'पैरवी कर रही हो? ठीक है, मगर फिर अगले को भी किसी से यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी कि मैं उसी की भाँति सोचूँ, जो उसे पसंद है वही करूँ?'

उसे लगा, वह घुमड़न से उलझ नहीं सकती।

उसे अगले पल यह भी लगा, उसे उठना चाहिए और काउंटर पर जाकर अपनी शिकायत दर्ज करानी चाहिए कि ऐसे क्यों हो रहा है। हफ्ते भर बाद वह यहाँ आई है और यहाँ लगातार 'कम सेप्टेंबर' की वही पुरानी धुन बज रही है, जिसे वह पिछले हफ्ते सुन चुकी है? क्या उनके संकलन में कुछ और अच्छी धुनें नहीं हैं, जिन्हें बदल-बदलकर बजाया जा सके? ऑर्डर आने में अभी देर है। धुनें बदलवाना जरूरी है। वह उठकर काउंटर की ओर बढ़ चली। उसे मालूम है, उसके अचानक उठने और काउंटर की ओर बढ़ने पर वह कोई सवाल नहीं करेंगे। ऐसा नहीं है कि वे सवाल नहीं करते हैं। सवाल करते हैं - कभी-कभी। उसे उनके तीन महीने पूर्व किए गए एक सवाल का जवाब अभी देना बाकी है। सवाल आसान नहीं है। न उसका जवाब इतनी आसानी से दिया जा सकता है। सवाल उसके होने से जुड़ा है। वह है, तो उसे उस 'होने' को महत्व देना ही पड़ेगा। जिम्मेदार व्यक्ति न अपने प्रति गैर-जिम्मेदार हो सकता है, न दूसरों के प्रति। यही उसकी अड़चन है, जिसने उसे ठिठका रखा है।

वह जानते हैं, वह उन्हें बहुत प्यार करती है। उन्होंने बहुत चिरौरी की थी माँ से -उन्हें सब कुछ छोड़कर जाना है, जाएँ। जैसा चाहेंगी, लिखकर दे देंगे। कोर्ट-कचहरी की फजीहत उन्हें पसंद नहीं। हाँ, बच्चे के बगैर जीना उनके लिए कठिन है। दुनिया में उसे आँखें खोलने के साथ ही उन्हें गहरे अहसास हो गया था कि वह उस आँखें मिलमिलाती नन्हीं जान के बिना नहीं रह सकते।

उन्होंने उसके जन्म के समय की अपनी भावनाओं को उससे आठ वर्ष की उम्र में बाँटा था कि उसके जन्म के समय उसे पहली बार देखने पर उसकी दादी ने उनसे कहा था, 'मुन्ना, छोरी बूबहू तेरे जैसी लगे है। अंगड़ाई तोड़ तू ऐसे ही आँखें मिलमिला रहा था, जब पहली दफे सौर में मैंने तुझे दाई की गोद में देखा था।'

उसके आग्रह पर धुन बदल गई।

वातानुकूलित खुनक-भरे वातावरण में राजकपूर की 'श्री420' के गीत 'प्यार हुआ इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यों डरता है दिल...' की मद्धिम छूती-सहलाती-सिहराती धुन तैरने लगी।

बदली धुन ने उन्हें भी अपने साथ गुनगुनाने के लिए मजबूर कर दिया।

'तन्वी'

'बोलो, पा!'

'पुराने गाने पुराने मूल्यों की तरह हैं, नहीं?'

'पुराने गानों में बड़ा दम है। कविता हैं।' 'मूल्य' शब्द से उसने स्वयं को बचाना चाहा।

उन्हें भी समझ में आ गया - वह माहौल को कड़ुवाहट में डुबाने से बच रही है।

बेयरा ऑर्डर ले आया।

चीज बाल्स, जिन्हें वह पकौड़े कहते हैं, बड़ी प्लेट में सजे भाप छोड़ रहे हैं। 'कसाटा' कलबत्ता दो अलग-अलग प्लेटों में है। उन्होंने एक प्लेट उसकी और खिसकाई और चीज पकौड़ा उठाकर दाँतों से कुतरने लगे। उनके दाँतों में उम्र मरोड़े लेने लगी है। पिछले महीने निचले जबड़े की दाहिनी एक दाढ़ को निकलवाया है उन्होंने।

'अजीब चलन हो गया है। किसी भी रेस्तराँ में चले जाओ, अंग्रेजी की धुनें ही बजती हुई मिलेगी वहाँ।'

'रेस्तराँ का चलन ही वहाँ से आया है।'

'क्यों, हमारे यहाँ ढाबे और मिठाइयों की दुकानों नहीं हुआ करती हैं?'

'हुआ करती हैं, मगर उन्हें कभी संगीत से नहीं जोड़ा गया।'

'हो सकता है, वहाँ भी अंग्रेजी धुनें बजने लगी हों।' वह हँस पड़े।

'अगली बार हम लोग किसी हलवाई की दुकान पर मिलेंगे। उड़पी-सड़पी में तो बर्तनों की खनक ही सुनाई पड़ती है।' उसने उनकी हँसी में साथ दिया।

चीज बाल्स खासे कुरकुरे और स्वादिष्ट बने हैं। 'कसाटा' में बर्फ की अकड़ है। उसने चम्मच से अकड़ को खूँदा। खूँदने से निश्चित ही उसकी अकड़ में कुछ नरमी आएगी। आइसक्रीम को पिघलाकर खाना उसे पसंद नहीं। फिर तो रबड़ी का दूध ही पीना चाहिए। उसकी देखा-देखी उन्होंने भी आइसक्रीम को खूँदकर नरम करना शुरू कर दिया। अपनी अकड़ को आदमी कभी खूँदता है?

आइसक्रीम खाते हुए वह उन्हें देख रही है। गले की चमड़ी तेजी-से ढीली हो रही है। वे अब कसरत-वसरत भी नहीं करते। पहले नियमित कसरत किया करते थे। भुजाओं की सख्त मछलियों पर उससे मुक्के मरवाया करते थे। फिर एकाध साँस छोड़ मछली को चिपकाकर, उसे बाँह में भर चूमते हुए कहते थे - 'तुम्हारी मार के डर से उठकर मछलियाँ भाग गईं।'

माँ के संग वह सौतेले पिता के घर आ गई थी।

स्कूल जाने से पहले उन्होंने ही उसे घर का टेलीफोन नंबर और पता रटवाया था। बच्चों को घर का पता और फोन नंबर भली-भाँति याद होना चाहिए। मुसीबत में काम आता है। तीसरी साँझ माँ और सौतेले पिता के घर से बाहर जाते ही उसने फोन का नंबर डायल कर उनसे बात की थी। वह जैसे उसके फोन का इंतजार कर ही रहे थे। पिछले तीन दिनों से वे दफ्तर नहीं गए थे। बैठे पी रहे थे। उसकी आवाज सुनते ही वे प्रलाप करते हुए से बोले, 'तुम्हें लेने कल मैं डोबीवली आ रहा हूँ, तुम्हारे बिना मैं जी नहीं सकता, मेरी बच्ची!'

'आपने तो कहा था, पा! मैं आपकी बेटी नहीं हूँ।'

'यह तुमसे किसने कह दिया?'

'आपको झगड़े के बीच कहते हुए सुना था।'

'वह तो मैंने, तुम्हारी माँ को नीचा दिखाने की मंशा से कहा था। गुस्से में मैं अंधा हो जाता हूँ।'

'तब फिर मुझे माँ के साथ क्यों आने दिया?'

'माँ की जिद के आगे हार गया। यह भी सोचा, इतनी छोटी बच्ची माँ को छोड़कर कैसे रह पाएगी, रह सकती हो, बोलो?'

'नहीं, रह सकती। माँ को भी मेरे साथ वापस ले आइए।'

'अब नहीं ला सकता। बाकायदा लिखा-पढ़ी हुई है। उस आदमी को अब वह नहीं छोड़ सकती। छोड़ना ही होता तो यहाँ से जाती ही क्यों?'

'पर पा, वह आदमी मुझे अच्छा नहीं लगता।'

'और उस आदमी को तुम?'

'मैं भी उसे अच्छी नहीं लगती।' वह सिसकने लगी थी।

'रोओ मत, मेरी बच्ची। बताओ, तुम्हारी माँ इस बात से परेशान नहीं है?'

'है, पा।'

'तब'

'मुझे अलग कमरे में सुलाने लगी है। मुझे अकेले डर लगता है, पा।'

'तेज होती सुबकियों के बीच उसने उन्हें सूचित किया था - घर की घंटी बजी है। उसका अनुमान है, माँ और सौतेले पिता घर आए हैं। मौका मिलते ही वह उन्हें दोबारा फोन करेगी।'

तेरह वर्ष कैसे कट गए! कट नहीं गए, काटे गए। माँ को उसने कभी भनक नहीं लगने दी - पा और वह कब, कहाँ, कैसे मिलते हैं। माँ उसे प्रतिक्षण चेतावनियों से लादती रही - उनका मरा मुँह देखे, अगर कभी वह अपने पा से बात भी करे। उसे अचरज होता माँ के मुँह से ऐसी भाषा सुनकर। आखिर उनके भीतर घृणा के कितने कुएँ हैं। जो अब तलक उलीचते-उलीचते भी खाली नहीं हुए? उन्हें कभी यह भी खयाल नहीं आया कि किसी बच्चे के लिए कितना मुश्किल होता है, जो उसका पिता नहीं है, उसे पिता कह कर पुकारना! उस घर में रहते हुए उसने सौतेले पिता से कभी कोई बात नहीं की। पढ़ाई में डूबी रहती दिन-रात। कक्षा में सदैव अव्वल आती। अव्वल आने ने ही रेलवे में नौकरी पाने में उसकी मदद की।

उन्हें छींकता हुआ पाकर वह अनायास चिंतित हो आई।

'क्या हुआ? ठंडा खाने का असर है?'

'ए.सी. कुछ बढ़ा हुआ नहीं लग रहा?'

'ठंडक जितनी थी, उतनी ही है, आइसक्रीम नुकसान कर गई। सर्दी आपको वैसे ही रहती है।'

चेहरे को लापरवाही से झटका उन्होंने, 'छोड़ो, छींक के डर से मैं आइसक्रीम खाना नहीं बंद कर सकता।'

'सुड़प-सुड़प' आवाज निकालते हुए वे आइसक्रीम खा जरूर रहे हैं, मगर उनकी निर्निमेष दृष्टि सामने पड़े परदों की सांधों से उलझी जाने कहाँ गुम हो गई है। ऐसी मुद्रा में वे जब भी होते हैं, उसे लगता है, उसके साथ होते हुए भी वे कहीं स्वयं से जा भिड़े हैं। अपनी भिड़ंत से बाहर आ अक्सर वे उसके लिए अपरिचित हो उठते हैं। तनिक हिंसक, जबकि वे हिंसक नहीं हैं। प्रकृति नहीं है उनकी हिंसक।

'तुम्हें मालूम है, तुम्हारी माँ का शक गलत नहीं है उसके बारे में।'

उसने चम्मच चाटते हुए पूछा, "समझी नहीं, किसके बारे में?"

'उसके बारे में जो जूते के कारखाने से घर रोज देरी से लौटता है। है एक मराठी लड़की उसकी जिंदगी में।'

चकित हो उठी। पा को कैसे मालूम? उसने तो कभी कुछ कहा नहीं। उन्होंने कभी कुछ पूछा भी नहीं। फिर? यानी माँ के बारे में सारी जानकारी है उन्हें! रास्ते अलग हो जाने के बावजूद जानकारी है तो उसे सच स्वीकार करना ही पड़ेगा। उन्हें मालूम है तो वह छिपा भी नहीं सकती। माँ की सिसकियाँ घर की दीवारें फाँद क्या उन तक दौड़ आती हैं?

'हाँ, इन दिनों माँ खासी परेशान रहती है।' उसने स्वीकारा।

उनके स्वर में विद्रूप उतरा, 'खामोशी से सह लेना चाहिए, जैसे मैं सह लिया करता था, जानते हुए कि वह चमड़ेवाले के साथ घूमती है।'

'अब पता चल रहा होगा उसे, अकेला कर दिया जाना कितना खतरनाक होता है।' उन्होंने आगे टिप्पणी की। जैसे उनके सामने वह नहीं, माँ बैठी हुई हो और उन्होंने अपने पंजों में बाघनख पहन लिए हों।

वह भेद नहीं पा रही है उनके चेहरों को। माँ की पीड़ा उनके नासूरों पर फाहा साबित हो रही है।

'उम्र में भी चमड़ेवाला उससे छह साल छोटा है।'

अब नहीं सहा जा रहा है। यह हिंसक व्यक्ति उसके 'पा' नहीं हैं। हों भी तो उसे स्वीकार नहीं। वहीं ठहरे हुए हैं, पुश्तैनी दुश्मन की तरह।

बेयरा तश्तरी में बिल ले आया।

लपककर उसने बिल उठा लिया। उनकी छीना-झपटी के बावजूद पहली बार बिल उसने चुकाया। कमाने के बावजूद उनका बिल चुकाना उसे अभिभावक का संरक्षण लगता रहा है, जबकि घर में वह माँ से अपने खर्च के लिए एक पैसा नहीं लेती, बल्कि हजार रुपया महीना उन्हें पकड़ा देती है। आठवीं कक्षा में आते ही उसने हिंदी पढ़ाने के दो ट्यूशन पकड़ लिए थे।

उसका बिल चुकाना उन्हें खिन्न कर गया।

स्वचालित दरवाजा खोलकर दोनों फुटपाथ पर आ गए।

'तुम घर रहने कब आ रही हो?' उनका सवाल उसकी चुप्पी को खरोचने लगा। बाहर उमस बढ़ गई है। उमस ने उसे अनमना कर दिया था। उमस उससे झेली नहीं जाती। सबसे बुरे लगते हैं उसे उमस भरे दिन लेकिन यह भी सच है कि पा के साथ वह जब भी होती है, उमस उसके पास फटकने से कतराती है। जाने आज क्यों उलटा हो रहा है। लग रहा है, उमस उनके साथ के बावजूद बढ़ रही है और निरंतर बढ़ती ही जा रही है, यहाँ तक कि साँसों में घुलती उसकी खारी आर्द्रता, साँसों को सीने तक पहुँचने नहीं दे रही है।

उसे मालूम है, साथ चलते हुए वह उसकी चुप्पी बरदाश्त नहीं कर पाते। किसी भी क्षण वे इस हिमाकत के लिए उसे टोक सकते हैं। उन्हें कुछ क्षण पहले किए गए अपने सवाल का जवाब भी चाहिए। सवाल नया नहीं है। तीन-चार महीने पुराना है। उन्होंने कहा था - जल्दी तय कर लो कब तुम चमड़ेवाले के घर से अपना झोला-डंडा उठाओगी। अपनी वसीयत भी उन्होंने तैयार करवा ली है। दो कमरों वाले उनके सुंदर फ्लैट की एकमात्र मालकिन वह है, उनकी बच्ची - तन्वी गुप्ता। उनकी अंतिम इच्छा है, वह अपने घर लौट आए। बालिग हो चुकी है अब वह।

वह सोचती है - वह क्या है आखिर! अपने लिए, उनके लिए माँ के लिए?

माँ ने कहा था, 'किसी भी हालत में मैं तन्वी को तुम्हारे पास नहीं छोड़ने वाली। जानती हूँ - तुम तन्वी के लिए तरसोगे, रोओगे, दीवारों से माथा सिर कूटोगे, कूटते रहो, जीवन पर्यंत कूटते रहो...'

एक साँझ उन्होंने उससे कहा था, 'जिस दिन तुम अपने घर लौट आओगी, उसके पास उसके आँसू पोंछने वाला कोई नहीं बचेगा।'

'बोलो तन्वी कब घर आ रही हो तुम?' उनका स्वर अधीर हो आया।

'किसके?' उसकी कनपटियों पर उमस पिघल रही है।

वे शायद मुस्कराए उसके सवाल पर, 'अपने और किसके।'

'वह तो आपका घर है, पा।'

वह चिढ़-से गए, 'जहाँ रह रही हो, वह किसका घर है?'

'माँ का।' कोई हिचक नहीं थी उसके स्वर में।

'पगली, वही तो मैं कह रहा हूँ, तुम अपने घर लौट आओ।'

'निर्णय ले लिया है, अपने घर ही लौटना चाहती हूँ, पा।'

'तब दिक्कत क्या है?'

'दिक्कत है, घर ढूँढ़ना।'

'क्या मतलब?' उनका स्वर गुर्राया।

'मतलब, अब मैं बालिग हो चुकी हूँ पा! और अपने घर में रहना चाहती हूँ। आपके पास ही वन-रूम-किचन किराए पर लेकर।'

उन्हें माटुंगा उतरना है और उसे डोंबीवली। शार्टकट आजाद मैदान ही है बोरीबंदर यानी शिवाजी टर्मिनल पहुँचने के लिए। उसने उनकी बाईं कोहनी धर ली और उन्हें सड़क क्रास करवाने लगी। उसे अचरज हुआ - उसकी पकड़ से उन्होंने अपनी कोहनी नहीं छुड़ाई। हठी बच्चे की भाँति घिसटते हुए ही सही, उसका अनुसरण करते हुए रोड क्रास करने लगे।


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