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निबंध

रक्ताश्रु
प्रतापनारायण मिश्र


हाय! हृदय विदीर्ण हुवा जाता है। आँसू रुकते ही नहीं। हाय-हाय सुनने से पहिले ही हमारा निरलज्‍ज शरीर क्‍यों न छूट गया। हाय पापी प्राण तुम क्‍यों न निकल गए। हाय इस अधम जीवन का अंत क्‍यों न हो गया। हाय आशा की जड़ कट गई। बस अब क्या है, अभागा भारत डूब जा। अरे अब तेरा कौन है? स्‍वामी दयानंद चल बसे। छाती पर पत्‍थर धर लिया। केशव बाबू सिधार गए, रो धो के कलेजा थाम लिया। यह दु:ख नहीं सहा जाता, हाय!!! अब क्या होगा? हाय हम तो हम, हमारे प्‍यारे राधाकृष्‍णदास को कौन समझावै? काशी ही नहीं अनाथ हुई, भारत माता के कर्म में आग लग गई। हाय देशहितैषिता विधवा हो गई। हाय हम क्या करें "एरे प्राण कौन सुख देखिबे को रह्यो जात। तूहू किन जात जित प्रीतम सिधरि गो"। हा! हा! हा!!! "क्या नजर जख्‍मे अंदरु आया। चशम् से रोते खूं आया।" दस अटकते-अटकते टूट गया। सर पटकते-पटकते फूट गया! हाय हमें संसार सूना देख पड़ता है। दुनिया उजड़ गई, हाय! इससे तो महा प्रलय हो जाती। हाय प्‍यारे हरिश्‍चंद्र! हाय भारत भूषण!!! हाय भारतेंदु!!! हा हा हा हा, अरे हम भी चलेंगे-हमसे नहीं सहा जाता। मेरे पूज्‍यपाद! मेरे प्रात: स्‍मरणीय! मेरे प्रेम देव! बुलावो। स्‍वर्ग में तुम्‍हारी सेवा कौन करेगा? हा हा हा!!! आ! हा! हा! दिल का क्या हाल करूँ। खूँने जिगर होते तक, हाय कौन लिखे, कौन पढ़े। अरे बज्रहृदय कविबचन सुधारस!!! यह क्या विष उगल दिया? अरे यह अकस्‍मात बज्रपात, हा! हा! हा! प्रेमाचार्य तो प्‍यारे से जा मिले अब भारत को उद्धार कौन करे? क्या…? अनेक देशभक्‍त जो हैं? कौन? कहाँ? किसको देख के? हा! "राका ससि षोड़स उवैं तारागण समुदाय। सकल गिरिन सब लाइये रबि बिन राति न जाए।" कौन अपना सर्वस्‍व निछावर कर देगा? किस्‍के बचन दिल को हिला देंगे? हा रससिद्ध कबीश्‍वर! हा भारत भक्‍त शिरोमणि!! हा सहृदय समूहाद्यगण्‍य!!! हा प्रेमीजन पूजित पादपीठ!!! हाय प्‍यारे, तुम्‍हारे निवास के ठौर को बोरत हैं अँसुवाँ बरजोरन। हाय जनवरी की 6 तारीख चांडाल काल। यह क्या किया? हाय "कहैंगे सबैही नैन नीर भरि भरि अब प्‍यारे हरिचंद की कहानी रहि जाएगी?" हाय मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, हा! हा!! हा!!! हाय आजु भरत अनाथ सब भाँति भयो भारती जू भूषण विहीन दीसैं मंद। हाय क्‍यों न प्रताप दीह ताप सों करेजो तपै भयो सुखदायक सुधा को सोत बंद। हाय भावत न हाय हाय के सिवाय कछु उरपुर रुधै है विषदन को बृंद हाय। हाय हाय हाय हाय हरि कीन्‍हीं अनरथ कैसी शोक हरिलोकहिं सिधारे हरिचंद्र हाय।।1।। बानी प्रेमसानी सों पियूष बरसावै कौन-कौन चहुँ ओर जस चंद्रिका पसारे हाय परताप चतुर चकोरन को ताप हरि भारत की भू को तम कौन निरुवारे हाय।। तरे बिन हेरत हिरात हियर कौ चैन आसुन में बूड़े जात नैनन के तारे हाय हरिचंद हाय भारत के चंद हाय बाबू हरिचंद। हरिचंद प्राणप्‍यारे हाय।।2।। हा! हा!! हा!!! ताकत तो साँस को भी नहीं आह क्या करूँ। क्या बेवसी है ऐ मेरे अल्‍लाह क्या करूँ।।


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हिंदी समय में प्रतापनारायण मिश्र की रचनाएँ