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निबंध

लत (चलती-फिरती बोली में)
प्रतापनारायण मिश्र


अहा! इन द्वै अखरानऊ मैं कैसो सवाद है कै कछू बोलते चालत नाय बने! एक बार हमारे प्‍यारे 'हिंदीप्रदीप' ने लिखी ही कै 'ल' (लकार) सगरी वर्णमाला को अमृत है और व्‍याकरण वारे कहैं हैं कै 'त' ('तकार') और 'लकार' दोऊ मुख के एकई स्‍थान तो कढ़ै हैं - 'लृतुलसा दंत्‍या'। फेर यामैं कहा संदेह रह्यौ कै या शब्‍द में द्वै-द्वै अमृतन को मेल है (कोऊ समय 'त' कार कोऊ गुण लिखैंगे)।

जब एक अमृत को सवाद मनुष्‍य न को दुर्लभ है तब द्वै अमृतन की तो बात ही कहाँ रही? जा काऊ को काऊ बात की लत पड़ जाए है वाय अपनी लत के आगे लोक परलोक, हानि-लाभ, निंदा बड़ाई आदि कों नेकऊ विचार नाएँ रहै है। लोग बड़े-बड़े कष्‍ट उठावैं हैं, सारे संसार सो आपको हँसावैं हैं, पै लत को निभावै हैं। यासों सिद्ध है कै लत मैं कछू तौ मिठास है जाके लिए सब प्रकार के दुख सुख सों सहे जाए हैं।

पारसी में ऐसे नाम बहुत से हैं जिनके पीछे लत की लगी है। पै सबके वर्णन को या छोटे से पत्र में ठौर कहाँ? तहूँ द्वै चार को नमनों दिखाय दिंगे। दौलत (धन) कों तौ कहनोई कहा है। नारायण की घर वारी (लक्ष्‍मी) ही ठैरी! सारे जगत को काम याई सों चलै है। भाँति-भाँति के पाप पुण्‍य याई के हेत करे जाएँ हैं। बड़े-बड़े अधमन को याई के लिए धरमावतार बनायबे परै है। जाए देखौ याई के कारन हाय-हाय कियो करै है। सौलत (दबदबा, प्रताप) - याऊ के निमित्त बड़े-बड़े बीर अपनी जान जोखौं में डारै हैं।

अदालत की कथा ही अकथ है। भाई-भाई की बात नाय सहै पै एक-एक चपरासी की लातऊ प्‍यारी लगै। सारी कमाई एक बात पै स्‍वाहा! सब जानै हैं कै जीत्‍यो सो हार्यौ और हार्यौ सो मर्यौ पै अदालत की बुरी लत बहुतेरन को। कछु निज को काम नाएँ होय है तौ औरन को तमासाई देखबे को धूप मैं धावै हैं। इत उत माँ ऊ 'कहा भयो कहा गयो' करत डोलै हैं। फजीलत (विद्वत्ता) की चाट पै लोग सारे सुखन को होम करि कै पढ़बेई मैं जीवन बिताय देतु हैं। जिल्‍लत (बदनामी) सगरो धन और सारी प्रतिष्‍ठा खोईबोई सों मिलै है।

कहाँ लौं कहिए, जा शब्‍द मैं लत को जोग होय वामै बड़ी ही बड़ी बातैं दीखैं हैं। फेर 'लत' को वर्णन सहज कैसे कह्यों जाए। संसार में बड़ी-बड़ी बातन को मूल लतई है! बड़ो नाम, बड़ो जस, बड़ो धन, बड़ो पद, बड़ो सुख, बड़ो दुख, बडो अजस, सब लत सोई प्राप्‍त होय है। परमेश्‍वर को नाना प्रकार की सृष्ठि रचने की लत है। उनको कुछु प्ररोजन नाएँ पै एक को बनावै हैं। एक को नसावैं हैं याई लत के मारे ज्ञानीन में जगतपिता, प्रेमीन मे जगजीवन कहावै हैं। पढ़े लिखेन में पूजे जाए हैं। गवाँरन की गारी खाय हैं।

पानी बहुत बरसै तौ मूरख कहिंगे, 'सारे के घर मैं पानी ही पानी है गयो है'। जब नाएँ बरसे तब कहै हैं कै 'नपूतो सूख गयो है।' धन्‍य रे नंद के छोरा! गारिऊ खाय है पै लत नाएँ छोड़े है। हमारे रिसीन कों भगवान के भजन और जगत के उपकार की लत परी ही, जाके मारे सारे सुखन को छोड़ि, संसार सों मुख मोड़ि, कंद मूल खाय-खाय बन में जाए रहे है। याई के फल सों ब्रह्मय कहावे है। आज ताऊँ हम उनके नाम सुन नार (ग्रीवा) नमावें हैं और उनके उपदेशन पर चलन बारे अपनो जनम बनावै हैं। हमारी सरकार और माड़वारीन को कमायबेई की लत है। कोई कछु कहे पे वे एक न एक रीति सो अपनोई घर भरिगे जिनको खुशामद की लत है वे हजूर की हाँ में हाँ मिलायोई करिंगे, देश सारी चाहे आज धूर में मिल जाए, प्रजा चाहे याई घरी नास है जाए, राजा चाहे भलेई अजस पावे, संसार चाहे कछू कहे कहावै पै लत तौ मरबेई पै छूटे तौ छूटे।

हमारे हिंदू भाईन कों आलस की ह्याँ ताऊँ लत है के लाख समुझावों पे सोयबो छोड़ेइँ नाएँ। चौबेन भाँग की है, गुसाँइन को मरकबे की लत है। धनीन को टेंटँई (वेश्‍या) की लत है, बाबून केा अँगरेज बनबे की लत है। कहाँ लौं कहैं, एक-एक लत सबको परी है, पे हाय, देशसुधार की लत साँची-साँची काऊ को नाएँ दीखे। तन, मन, धन, कर्म, लज्‍जा, प्रतिष्‍ठा सब सों अधिक भारत को माने जमाना, मैया जा दिना देशहित के लती उपजावेगी, वाई दिना सब संकट कटेगो।

हे दऊदयाल! हमारे भाई कहा मुख ही सों देशहित के गीत गायो करिंगे। इन्‍हें ऐसी बुद्धि कब देउगे के सगरो धन खोय के, जात बाहर होय के, देश विदेश जाए के, सबन की गारी लौं खाय के, देशी बिदेशी राजा प्रजा सबके कड़ुवे बनेंगे पे प्रान लौं देके भारत के हेत सब कुछ करिंगे। हम कौ लिखबे की लत है, खायबे को चाहे भलेई न मिलौ, साल में घटी मितनिई परौ, कोई रीझौ तौ वाह-वाह, खीझौ तौ वाह-वाह, पे कलम राँड चले बिना मानेई नाएँ! कोई सुनौ के न सुनौ पे हमें तौ बलबे की लत है, यासों कहेई जाएगे के जाए भेले कामन की लत परेगी, राधारानी बाई को भलो करेंगी। सब सों भली देशभक्ति है, जाए याकी लत नाएँ वाके जीवन पर लानत (लअनत) है।


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हिंदी समय में प्रतापनारायण मिश्र की रचनाएँ