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कविता

लड़की
कलावंती


लड़की भागती है
सपनों में, डायरी में
लड़की घर से भागती है, घर की तलाश में।
लड़की देखती है उड़ती पतंगें और तौलती है पाँव।
उसके देह से निकली खुशबू फैलती है
घर आँगन तुलसी और देहरी तक।
बाबूजी की चिंताओं सी ताड़ हुई,
अम्मा की खीझ में पहाड़ हुई,
लड़की घुटनों पर सिर डाले
उलझे उलझे सपनों में, आधी सोती, आधी जागती
एकदिन जब उसके मन के दरवाजे होंगे साझीदार
सोचती है,
और खिड़कियाँ गवाह।
वह दूब से उसका हरापन माँग लाएगी,
सूरज से उधार लेगी रोशनी।
चिड़िया से पूछेगी दिशा,
और आसमान का नीला रंग
उसके दुपट्टे में सिमट आएगा

 


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