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कविता

नारी
कलावंती


वेदमंत्रों में उच्चरित
अर्द्धनारीश्वर की महिमा मुझे तो
कहीं दिखती नहीं,
इसलिए बहुत सोचती हूँ इस पर
मेरी सारी सोच
जब किसी निराश बिंदु पर जाकर ठहर
जाती है
तो मेरी पूरी कोशिश होती है,
मैं इस बंद दरवाजे के
आगे की कोई राह तलाश लूँ।

औरत से जुड़ी मेरी अनुभूतियाँ कैनवास की खोज करती
कागज पर उतरने से रुकती है, काँपती है।
नारी तुमसे जुड़े अंत नकारात्मक ही क्यों
ठहरते हैं मेरी चेतना में।
तुम उर्वशी हो, अहिल्या हो
कैकयी हो, कौशल्या हो
किंतु तुम सबकी नियति
किसी न किसी राम या गौतम से
जुड़ी है।

 


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हिंदी समय में कलावंती की रचनाएँ