hindisamay head


अ+ अ-

कविता

प्रेम
कलावंती


मैंने कहा
प्रेम,
और झर पड़े
कुछ हरसिंगार
मैंने कहा
स्नेह,
और बिछ गए गुलाब।
मैंने कहा मित्रता,
और भर गई
सिर से पाँव तक अमलतास से
और जिंदगी
तुम्हारी शुभाकांक्षाओं के उजास से।

 


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में कलावंती की रचनाएँ