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कविता

मृत्यु के नजदीक प्रेम
कलावंती


इस बार मैंने देखा
मृत्यु को बहुत नजदीक से।
अपने नन्हें बच्चों को छोड़कर
अपने घोंसले से दूर जाते
मैंने एक विश्वास का हाथ पकड़ा
खुद से किया एक वादा
अगर लौट आई
आकाश पाताल पार कर
फिर धरती के रस्ते
देख पाई बसंत फिर से तो
स्वीकार करूँगी उस प्रेम को
जिसे अपने आप से भी छिपाकर सींचती रही
जिसे खुद से स्वीकार करने में भी जमाने लगे
वह प्रेम जो मेरे लिए रहा
पूजा प्रार्थना और अजान की तरह
उसे स्वीकारूँगी
अब अपनी पहचान की तरह।

 


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