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कविता

सपने
कलावंती


मैं अब टूटे सपनों के किरचों का
मातम मनाना नहीं चाहती
उन्हें समेट कहीं
दूर फेंक देना चाहती हूँ
जहाँ से उनके
टुकड़े टुकड़े होने की चीख
मुझ तक न पहुँचे।

 


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हिंदी समय में कलावंती की रचनाएँ