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कविता

चीख

कलावंती

अनुक्रम अध्याय 1     आगे

बहुत दिन पहले
तुमने दूर सन्नाटे को भेदती हुई
कोई चीख अनसुनी कर दी थी
और
आज तक वह चीख
काली भयावनी रातों में
भयानक अट्टाहास करती
तुम्हारा पीछा करती है
अनसुना करने का अपराधबोध
अमरबेल बन चिपक गया है
चेतना में हृदय में।

 


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