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कविता

आदमी
कलावंती


गुनगुना उठे हैं
फिर आज मेरे ओठ
बड़ा कमजोर है आदमी
ख्वाब में किए बंद पलकें
देखता है स्निग्ध चाँदनी
जबकि यथार्थ है अँधेरी अमावस सी
सारे जीवन के
सतत संघर्ष के एवज में मिली संवेदनहीनता
और
आँखों के आगे छाया विराट शून्य
जिसकी शून्यता में उसकी संघर्ष के लिए प्रेरित
शक्तियाँ भी समा गई हैं
स्वप्नभंग की यह स्थिति कितनी पीड़ादायक है
एक भयावह खोखलापन निरंतर
अनुभूत होता रहता है हमारे भीतर
जिससे हम आँखें चुराना तो चाहते हैं
पर चुरा नहीं पाते
क्योंकि यह तो बसी है हमारे रोम रोम में
एक बार फिर गुनगुना उठे हैं
फिर आज मेरे ओठ
बड़ा कमजोर है आदमी

 


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हिंदी समय में कलावंती की रचनाएँ