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कविता

चाह
कलावंती


किसी खूबसूरत लम्हे में
कोई यादगार चाह
पता नहीं क्यों
इतनी तीव्रता से जन्म लेती है
और अपनी पहचानी सीमाएँ बहुत धूमिल
पड़ने लगती हैं।

 


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हिंदी समय में कलावंती की रचनाएँ