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कविता

सन्नाटा
कलावंती


दूर दूर तक फैला सन्नाटा
लगातार फैलता जा रहा है
मेरी वीरान व्यथा
मानों मेरे मन में
सन्नाटे का मकड़जाल बुन रही है
काश मेरी खामोश
अभिव्यक्ति तुम्हारे पास भी इंतजार होता
दरअसल सच की खोज
या उसका इंतजार ही जिजीविषा है
आवरणहीन सच तो ढकेल डालता है
आतंकमयी निराशा की घाटी में

 


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हिंदी समय में कलावंती की रचनाएँ