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कविता

चालीस पार की औरत
कलावंती


एक

किसी बरसात की
घनघोर बारिशवाली रात
एक चालीस
पार की औरत
भीगती हुई थरथराती है
कुछ अघोरी आवाजें
हर वक्त उसका पीछा करती हैं
यह बरगद की जटा पकड़कर
झूलनेवाली डायनों की आवाजें हैं
वे हर अमावस की रात
बरगद की जड़ें पकड़कर
खेलती हैं छुआ-छुई का खेल

चालीस पार की औरत को लगता है
ठीक बरगद की तरह ही ठहर गई है उसकी जिंदगी भी
वे जहाँ हैं वहाँ से हिल भी नहीं सकतीं
कभी कभी उन्हें लगता है
बरगद की झूलती हुई जड़ें
उनके ही खुले हुए केश हैं
रातभर अपनी चिंताओं और कुंठाओं के साथ
वे ही उनमें झूलती हैं।

दो

कभी कभी बड़ी खतरनाक होती है
यह चालीस पार की औरत
वह तुम्हें ठीक ठीक पहचानती है जिसे
तुम नहीं पढ़ा सकते चालीस का पहाड़ा
क्योंकि वह खुद को भी अच्छी तरह पहचानती है
वह समझती है जीवन का ऊँच नीच
जानती है कहाँ लपेटेंगे उसे पंक कीच
वह तुम्हारे छल पहचानती है
और हँसती है एक निष्छल हँसी
वह घूमती है तीनों लोकों में
तीनों युगों में - त्रेता, द्वापर और कलियुग।
बचाए रहती है अपने हिस्से का सतयुग
वह पानी पिला भी सकती है
और पानी उतार भी सकती है
चालीस पार की औरत के पास होती है सत्ता
उसके अपने संविधान के साथ।
बड़ी खुद्दार हैं, खुदमुख्तार हैं ये

 


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