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कविता

घर वापसी
त्रिलोचन


साबरमती रुकी है। इंजन बिगड़ गया है।
ठीक-ठाक करने में कितने हाथ लगे हैं
फैजाबाद ने खबर पा कर, सुना, कहा है
इंजन सुलभ नहीं है। यात्री थके-थके हैं।

घंटा गुजर गया, तब गाड़ी आगे सरकी
आने लगे बाग, हरियाले खेत, निराले;
अपनी भूमि दिखाई दी पहचानी, घर की
याद उभर आई मन में; तन रहा सँभाले।

क्या-क्या देखूँ, सबसे अपना कब का नाता
लगा हुआ है। रोम पुलकते हैं; प्राणों से
एकप्राण हो गया हूँ, ऐसा क्षण आता
है तो छूता है तन-मन कोमल बाणों से।

अपने आस-पास हूँ, खोया हूँ, अपने में,
जैसे बहुत बिछोही मिल जाए सपने में।

 


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