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कविता

पावन मंसूबा
त्रिलोचन


पंडा रामप्रसाद ने कहा, धर्म जगा है,
धर्म विरोधी देखें, धर्म नहीं डूबा है,
गंगा यमुना के घाटों पर ठाट लगा है
सहज विरागी भी विराग से अब ऊबा है।
धर्म कर्म का बढ़ने वाला मंसूबा है
संगम, महाकुंभ फिर तीर्थराज ये तीनों
अलग अलग भी दुर्लभ हैं, पावन दूबा है
अभिषेचन के लिए। उमंग से भरे दीनों
के दल पर दल आते हैं। अवमानित, हीनों
के जीवन प्रसून खिलते हैं। सब नर नारी
भूले हुए चले आते हैं, पथ पर बीनों
को छेड़ कर गा रहे हैं, बिसरी लाचारी।

धर्म न होता तो वह दुनिया कैसे होती,
पुण्य न होता तो प्रवृत्ति क्या ऐसे होती।

 


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