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कविता

यह सुगंध मेरी है
त्रिलोचन


नदी के किनारे
पुकार एक
मैंने सुनी
कल शाम
यों उस पुकार में
किसी के लिए
संबोधन नहीं था
फिर भी
मुझे जान पड़ा
जाने क्यों
यह पुकार मेरी है
तो भी मैं बोला नहीं।

सूने राजमार्ग पर
परस मिला मुझे
जरा गरमीला
आधी रात
यों उस परस में
किसी के लिए
अनुरोध नहीं था
फिर भी
मुझे जान पड़ा
जाने क्यों
यह परस मेरा है
तो भी मैं चौंका नहीं।
बौरे आम के तले
सुगंध मिली
मुझे आज
प्रातःकाल
यों उस सुगंध में
किसी के लिए
आमंत्रण नहीं था
फिर भी
मुझे जान पड़ा
जाने क्यों
यह सुगंध मेरी है
तो भी मैं खिला नहीं।

 


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