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कविता

पहाड़ी बहादुर
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी


इन्हीं दिनों की बात है
पिछले वर्ष इन्हीं दिनों दिखा था
वह इस मुहल्ले में

ऐसी ही शीतलहर थी
ऐसे ही सिकुड़ा था यह मुहल्ला सर्दियों में

तब सामने वाले सेठ का
यह नया-नया महल नहीं बना था
और सूखा नहीं था वह आम का पेड़

इन्हीं दिनों ठिठुरा हुआ आया था
वह पहाड़ी बहादुर पर्वत लाँघ कर
छोड़कर गाँव में अपनी अकेली माँ
और एक अबोध भाई

वह जागता था सबसे पहले
सोता था मुहल्ले में सबके बाद
माँजता था बर्तन
फींचता था कपड़े
घोड़ा बनता नाक पोंछता
सेठ के छोटे बच्चे को
पहुँचाता था सुबह-सुबह स्कूल

जानता था वह मालिक का स्वाद
खट्टी चटनी और मीठा अचार
पहचानता था मालिक का सिर
और राहतरूह तेल की महक

पहनता था एक उटुँग कमीज
और चकती वाला हाफ पैंट
लड़ जाता था मालिक की जवान बेटी के लिए
मुहल्ले के शोहदों से

रोता नहीं था वह
जब कभी सुनता गालियाँ
चला आता मेरे घर
दीवार की ओर मुँह करके कोने में
उड़ जाता पर्वत पार अपने गाँव

एक दिन सेठानी ने
मेरी पत्नी के कान में खोला एक रहस्य
कि जिस दिन आया यह पहाड़ी बहादुर
उस दिन सेठ को मिला
अपने घर के पीछे गड़ा हुआ खजाना
और जल्दी-जल्दी में बना यह महल

तब से सेठ जी रोज सबेरे
सबसे पहले देखते हैं बहादुर का मुँह
और रोज-रोज कुछ ऊँचा होता जाता है
उनका महल।

 


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