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कविता

शुरुआत
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी


शुरू करो क ख ग से।
भाषा जो बोलते हैं उनकी है।

बेतों के जंगल में
कुछ भूखे-नंगे लोग
दूसरों के लिए कुर्सियाँ बीन रहे हैं।

तुम क्या होना चाहते थे
और वह क्या है
जिसने तुम्हें वह नहीं होने दिया?

स्त्री बच्चा
रोटी बिस्तर
या और कुछ?

तुम यहाँ जैसे आए थे
क्या वैसे ही रह गए हो?

शुरू करो क ख ग से।
भाषा अर्थहीन हो गई है
लौटो और देखो।
कुछ लोग अब भी खड़े हैं।
लाख ढकेलने के बावजूद
          ढहे नहीं हैं।
बता दो पुलिस को
अँधेरे को, सन्नाटे को
अट्टहास करती, मुँह बिराती
मशीनों को, चीजों को
          वे अभी हैं,
          हैं और ढहे नहीं हैं।

 


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