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कविता

एक दिन हँसी-हँसी में
केदारनाथ सिंह


एक दिन
हँसी-हँसी में
उसने पृथ्वी पर खींच दी
एक गोल-सी लकीर
और कहा - 'यह तुम्हारा घर है'
मैंने कहा -
'ठीक, अब मैं यहीं रहूँगा'

वर्षा
शीत
और घाम से बचकर
कुछ दिन मैं रहा
उसी घर में

इस बात को बहुत दिन हुए
लेकिन तब से वह घर
मेरे साथ-साथ है
मैंने आनेवाली ठंड के विरुद्ध
उसे एक हल्के रंगीन स्वेटर की तरह
पहन रखा है

 


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