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कविता

दाने
केदारनाथ सिंह


नहीं
हम मंडी नहीं जाएँगे
खलिहान से उठते हुए
कहते हैं दाने

जाएँगे तो फिर लौटकर नहीं आएँगे
जाते-जाते
कहते जाते हैं दाने

अगर लौट कर आए भी
तो तुम हमें पहचान नहीं पाओगे
अपनी अंतिम चिट्ठी में
लिख भेजते हैं दाने

इसके बाद महीनों तक
बस्ती में
कोई चिट्ठी नहीं आती।

 


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