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कविता

यह अग्निकिरीटी मस्तक
केदारनाथ सिंह


सब चेहरों पर सन्नाटा
हर दिल में गड़ता काँटा
हर घर में है गीला आटा
वह क्यों होता है ?

जीने की जो कोशिश है
जीने में यह जो विष है
साँसों में भरी कशिश है
इसका क्या करिए ?

कुछ लोग खेत बोते हैं
कुछ चट्टानें ढोते हैं
कुछ लोग सिर्फ होते हैं
इसका क्या मतलब ?

मेरा पथराया कंधा
जो है सदियों से अंधा
जो खोज चुका हर धंधा
क्यों चुप रहता है ?

यह अग्निकिरीटी मस्तक
जो है मेरे कंधों पर
यह जिंदा भारी पत्थर
इसका क्या होगा ?

 


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