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कविता

शहरबदल
केदारनाथ सिंह


वह एक छोटा-सा शहर था
जिसे शायद आप नहीं जानते
पर मैं ही कहाँ जानता था वहाँ जाने से पहले
कि दुनिया के नक्शे में कहाँ है वह !

लेकिन दुनिया शायद उन्हीं छोटे-छोटे शहरों के
ताप से चलती है
जिन्हें हम-आप नहीं जानते।

जाने को तो मैं जा सकता था कहीं भी
क्या बुरा था भैंसालोटन ?
हर्ज क्या था गया या गुंटूर जाने में

पर गया मैं गया नहीं
(वैसे भी संन्यास मैंने नहीं लिया था)
कलकत्ते से मिला नहीं छंद
जयपुर जा सकता था
पर गालता के पत्थरों ने खींचा नहीं मुझे
शहर अनेक थे जिनके नामों का जादू
उन युवा दिनों में
प्याज की छौंक की तरह खींचता था मुझे

पर हुआ यों कि उन नामों के बारे में
सोचते-सोचते
जब एक दिन थक गया
तो अटैची उठाई
और चप्पल फटकारते हुए
चल दिया पडरौना - उसी शहर में
जिसके नाम का उच्चारण
एक लड़की को लगता था ऊँट के कोहान की तरह

अब इतने दिनों बाद
कभी-कभार सोचता हूँ
मैं क्यों गया पडरौना ?
कोई क्यों जाता है कहीं भी
अपने शहर को छोड़कर -
यह एक ऐसा रहस्य है
जिसके सामने एक शाम ठिठक गए थे गालिब
लखनऊ पहुँचकर !

पर जो सच है वह सीधा-सा
सादा-सा सच है कि एक सुबह मैं उठा
बनारस को कहा राम-राम

और चल दिया उधर
जिधर हो सकता था पडरौना -
वह गुमनाम-सा शहर
जहाँ एक दर्जी कि मशीन भी इस तरह चलती थी
जैसे सृष्टि के शुरू से चल रही हो उसी तरह
और एक ही घड़ी थी
जिससे चिड़ियों का भी काम चलता था
और आदमी का भी
और समय था कि आराम से पड़ा रहता था
लोगों के कंधों पर
एक गमछे की तरह।

पर शहर की तरह
उस छोटे-से शहर का भी अपना एक संगीत था
जो अक्सर एक पिपिहिरी से शुरू होता था
और ट्रकों के ताल पर चलता रहता था दिन भर
जिसमें हवा की मुरकियाँ थीं
और बैलगाड़ियों की मूर्च्छना
और धूल के उठते हुए लंबे आलाप
और एक विलंबित-सी तान दोपहरी-पसिंजर की
जो अक्सर सूर्यास्त के देर बाद आती थी

इस तरह एक दुर्लभ वाद्यवृंद-सा
बजता ही रहता था महाजीवन
उस छोटे-से शहर का
जिसकी लय पर चलते हुए
कभी-कभी बेहद झुँझला उठता था मैं
कि वे जो लोग थे उनके घुटनों में
एक ऐसा विकट और अथाह धीरज था
कि शाम के नमक के लिए
सुबह तक खड़े-खड़े कर सकते थे इंतजार

नमस्कार ! नमस्कार !
मैं कहता था उनसे
उत्तर में सिर्फ हँसते थे वे
जिसमें गूँजता था सदियों का संचित हाहाकार...

 


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