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कविता

कब खुला आना जहाँ में और कब जाना खुला
राजेश रेड्डी


कब खुला आना जहाँ में और कब जाना खुला
कब किसी किरदार पर आख़िर ये अफसाना खुला

पहले दर की चुप खुली फिर ख़ामुशी दीवारों की
खुलते-खुलते ही हमारे घर का वीराना खुला

जब तलक ज़िंदा रहे समझे कहाँ जीने को हम
वक्त जब खोने का आ पहुँचा है तो पाना खुला

जानने के सब मआनी ही बदल कर रह गए
हमपे जिस दिन वो हमारा जाना-पहचाना खुला

हर किसी के आगे यूँ खुलता कहाँ है अपना दिल
सामने दीवानों को देखा तो दीवाना खुला

थरथराती लौ में उसकी इक नमी-सी आ गई
जलते-जलते शम्अ पर जब उसका परवाना खुला

होंटों ने चाहे तबस्सुम से निभाई दोस्ती
शायरी में लेकिन अपनी ग़म से याराना खुला

 


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