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कविता

थोड़ी-सी जगह
चंद्रेश्वर


रेल की इस जनरल बोगी में चाहिए मुझे
थोड़ी-सी जगह
जहाँ रोप सकूँ मैं
अपने पैर

किस कदर भरी है बोगी
ठसाठस
खिड़कियाँ तक ढँकी हैं
भीड़ से

कहीं कोई सुराख नहीं
कि आ सके इसमें
ताजा हवा
मौसम भी उमस भरा
चिपचिपा
कोई गुंजाइश नहीं
जरा भी
कोन चाहेगा होना बेदखल
अपनी जगह से
ऐसे में हो रहा दूभर
साँस लेना

अब मैं एकदम नाउम्मीद
कि पाना जगह बोगी में
थोड़ी-सी भी
नामुनकिन

यूँ ही काटना होगा सफर
किसी तरह टिकाए पैर
उँगलियों पर...
कि खिड़की के पास
सीट पर बैठा आदमी सिकुड़ते हुए
तनिक बनाता है मेरे लिए
थोड़ी-सी जगह !

 


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