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कविता

पहलवान चाचा
चंद्रेश्वर


कौन नहीं जानता गाँव-जवार में
नासिर मियाँ को
मशहूर जो पहलवान चाचा के नाम से
हैं अस्सी-पिचासी के
दिखती उनकी मांसपेशियाँ कसी-कसी
उनका कद दरमियाना है
उनकी 'सहज विलंबित मंथर गति' के तो
कहने ही क्या
उन्होंने सीखे नहीं सिर्फ दाँव-पेंच
पहलवानी के ही
उनके पास हुनर कई एक से बढ़कर एक
वे पलक झपकते बैठा देते
कैसी भी मोच खाईं हड्डियाँ
सही कर देते कोई दबी नस
हँसा देते रोते आदमी को
मर्सिया के साथ गाते सोहर भी
मुहर्रम में 'बाना-बनैठी' 'गदका' खेलते
तो बनते दशहरे की रामलीला में
हनुमान भी
देने पर इनाम किसी काम के बदले
कहते इतना भर की 'मना किया है
कुच्छो लेने से मेरे उस्ताद ने!'

आज पहलवान चाचा जान पड़ते पात्र
किसी काल्पनिक दुनिया के
जाने किस मिट्टी या धातु के बने हैं
जो टस से मस नहीं होते
मेरे वक्त में
अपने वक्त में
नेक इरादे से!

 


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