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कविता

वजूद ही उसका !
चंद्रेश्वर


एक ताजा गुलाब
हू-ब-हू
पूरा का पूरा
मेरी स्मृतियों में
महफूज था
लंबे अरसे से
जैसे ताखे पर रखा हो
घर के किसी कोने में

एक रोज मैंने छूना चाहा
आहिस्ते
स्मृतियों में रखे ताजे...
उस पूरे गुलाब को
कि झड़ गईं पंखुड़ियाँ उसकी
बेआवाज
पल भर में...

नष्ट हो गया
वजूद ही उसका !

 


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