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कविता

उपज
राजेंद्र प्रसाद पांडेय


क्या हो जाता है जब
सृष्टि के छतनार
पेड़ की पत्तियों के मध्य
गहरा जाने पर नीलाभा
ऊपर फूलने पर ललछौहें फूल
अंधी होती पृथ्वी की ओर
लग जाती हैं हर किसी की आँखें
और पेड़ की टहनियों पर
एक पैर से
आ टिकते हैं परिंदे
रेत में लेट जाती हैं टिटिहरियाँ
नीचे कर पंख और ऊपर पाँव
गड्ढों में आ उतरते हैं
तीतर, बटेर और फुदकी
अपनी-अपनी आँखें मूँद
आसमान की ऊँचाई में
सुरक्षा का भरोसा छोड़

क्या हो जाता है तब जब
सब-कुछ को समा लेने वाले आकाश में
उछाल दिये जाने पर निराधार
खिलखिलाता रहता है बच्चा
नीचे गिरने पर
चूर-चूर हो जाने के
भय से बेखबर

क्या हो गया है यह कि
हवा के कंधों पर
क्षितिज में उड़ रहे हैं बादल
महाशून्य में नाच रहे हैं
ग्रह और नक्षत्र
पकड़े एक-दूसरे के हाथ
और दुनिया में फैल गये हैं
शब्द और प्रकाश और अंधकार

क्यों जेठ की तपन में
उगाई जाती है बेहन
और क्यों इसी समय
पृथ्वी के रोमांच-जैसे
फूट पड़ते हैं
बाँसों और कंदों में अँखुए
और बोलने लगते हैं मेढक

किस विश्वास से
चादर पसारे खेतों की ओर
चल पड़ता है किसान
बस्ती की ओर हवा
और गाने लगते हैं पाँखी
सुबह के स्वागत के गान
अंधाकुप्प अँधेरे की गिरफ्त में

किसलिए पतझड़ में
नंगाझोरी दे देते हैं पेड़
खिल जाते हैं फूल
और झाँकने लगती हैं बतियाँ

ऐसा क्यों होता है कि
कुतिया, बिल्ली और शेरनी के
जबड़ों में दिये अपनी गर्दन
उनके दाँतों में टँग कर शिशु
एक से दूसरे और तीसरे और चौथे
स्थानों की कर जाते हैं यात्रा
अनखुली आँखों
और बंदरिया की कोख से चिपककर
उसका चंचल बच्चा
मनुष्य के बच्चों के ढेलों के
बचा जाता है वार
माँ के द्वारा लगा दी गई
छलाँग के साथ

किस बल के उछाह में
ऊँचे पत्थरों के घेरे तोड़
अनंत यात्रा पर
निकल पड़ता है जल
जीवन के गीत गाता
घाटी की ढलानों की ओर
पत्थरों से भिड़ता

क्यों हिंडोला बन जाते हैं
कर्म-कर्मश हाथ
तोतली हो जाती है जुबान

किस भरोसे
पोषक दूध से
बच्चे पालती है शेरनी
जो बड़े होकर
एक ही पंजे में
उस-जैसी कितनों का
तमाम कर दें काम

किस बल पर किसान
मुश्किलों की मुट्ठी-भर कमाई
हल के फाल से भुरभुरी
मिट्टी में बिखेर देता है
क्यों, आखिर क्यों
प्रेम की कच्ची-पक्की
डोर में बंध
आगे-आगे सप्तपदी के फेरे देती
खून के रिश्ते दर-किनार कर
सिंदूर की चुटकी के आगे
मौरी-सज्जित माथ झुका देती है वधू
और खुद को दो फाँक कर
मनुष्य की पीढ़ी आगे बढ़ा देती है

असल में धूल, धुआँ, धक्कड़-भरी
चक्कर मारती इस दुनिया में
तभी उपजता है कुछ सुंदर जब
सब-कुछ का भारी-भरकम
न-कुछ के नाजुक कंधों पर आ टिकता है

 


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