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कविता

नदी-चक्र
राजेंद्र प्रसाद पांडेय


प्रकट अस्तित्व के साथ अप्रकट स्वरूप लिये
कुलबुला रही है नदी ब्रह्मांड की कोख में
अनाहत नादों के भविष्यवक्ता तर्जन
कर रहे हैं अगवानी

दौड़ पड़े असंख्य बिंदु हुआ मिलनोत्सव
दरक गयी धरती फट पड़ा आसमान
बजने लगे बाजे फूटे मंगलगान
जनम गयी नदी रोती-चिल्लाती मारती हाथ-पाँव

फैल पड़ी धरती में छीजती-पसीजती
फूट रही आँसुओं की आँखों में
महक रही आमों के गुच्छों में
छिपी हुई भूसे में बखरी का अन्न बनी
आँतों में सीझ रही रोटी
फूलों में पत्ती में
दहक रही भट्ठी में नदी
जितनी की यात्रा उतना पाया विस्तार
आगे है असीम
बचा रहा बिखरा अस्तित्व आत्मकेंद्रित
मंथर गति क्षीण मति लघुता को बड़प्पन में
माधुर्य को खारेपन में डुबाने की पुकार

सबसे बड़े में मिल सबसे नीचे पड़
खो गयी है नदी सबसे ऊपर
उड़ जाने को तैयार
माँ की कोख में
पाने को नया जन्म
देने को नये जन्म

 


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