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कविता

माँ
राजेंद्र प्रसाद पांडेय


बिखर गयी है सृष्टि में माँ
कहीं जमीन फोड़
अभीं-अभीं उग आयी हरियाली
कहीं छतनार लुभावना पेड़
कहीं फूलों-फलों भरी लता
और कहीं कीचड़ में सड़ता पेड़ से गिरा पत्ता

मगर दर्जनों-दर्जन जीवनों के
कइयों-कई वसंतों में बँट
खुद माँ अब वसंत नहीं रही
न रही रिमझिम झमाझम बरसात

टंगरी फैलाये
बेटे-बेटियों के बीच
तले आलू और मटर बाँटती माँ
अब खुल कर खिली धूप भी नहीं रही

पका गमकता अमरूद न रही अब माँ
पनिहाई गुदाज रोटी या आलू-गोभी की तरकारी
भूख की गंध फैलाती गोद में
लेने-लेने को होती दो बाँहें भी नहीं रही माँ
अब घूघूमैया खेलाने
और मालिश में लिटाने की
टाँगें भी नहीं रही
और न ही रही वह
बकैंया चल बच्चों को
''पकड़ो-पकड़ो'' कर पीछा करती खिलखिलाती हँसी
बाबू से चुराकर पैसे देती
बाबू की घुड़कियों पर अड़ती-झगड़ती
बेटे-बेटियों को बचातीरो-रो कर घर भरती
भी नहीं रही माँ

गोद के पालने में
बचपन दुलराते
समूचे अस्तित्व से
बच्चों में जाते
छकने भर का दूध
छाती में टाँगे
क्षीर-सागर न रही माँ

फिर भी माँ
अभी है माँ
बढ़ी ठंड के लिए
कौड़ा बन जलती
गर्मी के खिलाफ
सहलाती बयार
और बरसते बादलों के आगे छप्पर का साया

खटिया पर लेटी-बैठी
खाँसती-खँखारती
उखड़ी साँसें सँभालती
हर घटित को भाँपती
अघटित को पछताती
ठठरियों, झुर्रियों के समूह में
अभी भी घटित हो रही है माँ

हर ऋतु की मिठास
फूलों-झरा पेड़
बीजों-झरा फल

और रहेगी
अपने बनाये साम्राज्य में
आगे न बढ़ने देने के हठ में
काल की सेना से
अकेले लड़ने को
खुद के तैयार किये
जवानों के कंधों लदी
सृष्टि की सम्राज्ञी
माँ!

 


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