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कविता

आँसुओं में माँ
राजेंद्र प्रसाद पांडेय


तन से धरती मन से आकाश
मौसम-बेमौसम रोदन में तपती बरसात थी
सारा खारापन, समूची उमस
उलीचने को बरसती
बना रहने के लिए ठंडा-मीठा जल
सुस्वादु अन्न
आगामी पीढ़ियों के लिए
भीतर से फूट कर अपने ही ऊपर बहती
एक बाढ़ थी
निचुड़ कर आँखों से बह आते
आगे की दुनिया, सुनने-बोलने वाले
डूब-उतरा उठतीं घटनाओं की कश्तियाँ
और आँखें पावस-काल में
उफना आये भाषा के झरने बन जातीं
अंततः माटी में मिल
पहुँच गयी आसमान में माँ
पृथ्वी की उर्वरता बढ़ाने के लिए
काली-सफेद घटा
औंधे-मुँह आ गिरती
जमीन पर गलदश्रु
आसमान में छिपकर बैठी माँ
जब रोती है
पेड़-पौधों पर जमी हुई धूल
इमारतों की गंदगी, मन की उमस
सब कुछ धो देती है
धुली-पुँछी सृष्टि ढूँढ़ती है
माँ कहाँ है
धोते-पोंछते आँसुओं में
खो गयी है माँ

 


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