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कविता

आत्मविस्मृतियाँ
मृत्युंजय


तिमिर के गहरे धरातल में छिटकतीं रश्मियाँ बेमेल
स्याह का सफेद का विचित्र गुँथा खेल

कैसे-कैसे दिन हैं गुरू कबीरदास
तुम-हम गाया करेंगें साखी-सबदी बोल
अपने ही मुर्चाए पदबंध खोलने का जतन करेंगें

और जब उजड़ा-सूना नगर प्रांत
हो शांत, रहस्यों की चादर खिंचती जाए है जीवन के इसपार
हारकर सत्य सच्चिदानंद रूप विश्राम धम में जा अटके हों मानव लघु
रूठे-रूठे पिय गला भींच कर गाते अहं-टडं
तब क्या होगा!

'इतनी लयकारी ठीक नहीं' यह कविता है, इसमें बसते हैं
अग्निहोत्रा दुर्वासा, उनकी छाया से डरो
नहीं तो माँगोगे तुम भीख।
कविता में न फोड़ो बताशे
ताशे बजाओ,
भीतर की भीतर रखो, बाहर, वो भाड़ में जाए

बच्चे किताबें धुनें
और और धुनकर के
सातों समुंदर पार परीदेश पहुँच जाएँ
बस फिर तो अपने भी पहुँच कर
रति-रंग-रोगन-रासायनिक-रहस्य-रात
रेशमी राइफलें
राकपफेलर जी से माँग लाएँ

आँय-आँय,
नक्कारे ! चलो गाएँ

क्या इतनी उलझी हुई सिम्त दर सिम्त जिंदगी
पीछे का बंधन अनुप्रास लहराता दुर्दम-दलदल
चलचल
मुक्तिप्रिया की पग की ही
ध्वनि सुनते-सुनते बीत चले हैं सहस्राब्द
अब समय शब्द के सुई छेद से गुजरा ऊँट

पूँछ पकड़ कर खींच रहे हैं
वीर-बली-बलवान-बनैले
बसरा के उस घाट टंके बीहड़ राज्य आयोजित नरसंहारों में
सनसन चलती है हवा रात भर जाड़े से मरता-भरता, माँगता झिंगोला
भनभन ओले बरसाते हैं निष्णात हाथ
शिशु, इस महाठगिनी माया के हाथों खेल रहा है

किस की सुनें कहाँ तक भटकें दिल्ली वा उज्जैन
देवास पहुँचकर एक फेफड़ा काट तौल देने से निर्देशक जी खुश होते हैं
ऐसे मीठे बैन
गुरु कबीर! आजकल कौन रोल में हंट हुआ टैलेंट तुम्हारा
पुचकारा गाया आँखिन देखी के दीदे तो फूट चले हैं

वह तो अपनी ही आँखों की पुतलियाँ उलटकर डरता रहता था बेहूदा

चलो, पुराना भरम मिटाएँ और एकदम नया बनाएँ...

नए-नए
दरबारे-आम में खास खास खबर
बढ़ते चलने वालों के कंधों से उतार लिए गए हैं सर
बुश ने खुश होकर बादशाहे-जहाँ से कहा, कान कहाँ हैं
दीवारों में सब्जियाँ उगती हैं आजकल बसरा में
तुमको पता नहीं किस्से कैसे घुसा हुआ था ऊँट घड़े में
अरबों ने खोजा मिलकर नहीं मिला फिर हमने खोज-खीजकर
मधुघट मधुपट से आवेष्टित कर दूर शब्द के परे
आतंकी अर्थच्छाया से दूर उत्तर की सरहद के भीतर फेंक दिया उसे
एहि बिधि वह तो दक्खिन दिशि में चला गया
आओ, हमें दुआ की रस्म मालूम है

चलौ चलौ
तनि आगे कै हवाल का मजा छोड़कर जरा जरूरी बातों की सुध करो
लल्लू ने कहा सदासुख से
तुम मेरी काँख ढाँके रहो लाल, मैं तानता हूँ मुट्ठी
तुम भी यही करो
ईश्वर, ज्ञान, संविधान,
फिर क्या आदमी की जिंदगी से बड़ा क्या क्या नहीं होता

डर के आगे जीत है या मौत
जो हजार भेष धर के हमारे दरवाजे के पीछे से भी आ चुकी है
ऐसे में कूच करने में घबराना स्वाभाविक है
मरकर जिंदा रहना और इसके उलट में भी
मरना तो निश्चित है

माफी माँगने की शानदार बात माफ करने की बात से पहले जन्मी
यहीं से नेकी और जफा के बीच शरमाना पैदा हुआ
तो रथ क्या है आनंद ने पूछा
न पहिए न पताका न घोड़े न लगाम
रथ का अ रथ बूझो
इस तरह सोच का एक युग सीढ़ियों से उतरा
जब एकदम नया कवि पुराने औजार से हारा
याद करने में अपनी अलबलाहट के नाते

नोट, वोट और चोट की तुक से कनकनाए गुरु
कबीर ने काले आदमी के शेयर के बारे में पूछा
चूजा, मेरी जी पी एफ की आदत ने रोना शुरू किया
सरकार का बच्चों के साथ क्या रवैया है
क्या है अर्थव्यवस्था महँगाई ने दस्तावेज लिखे
दिखे वित्तमंत्री मंथर मटकते मुसद्दीलाल के साथ महत्वाकांक्षी मास्टर मनमोहन
मिस्टर का तुक बैठ जाए कोशिश करते हुए
जाले और ताले और भाले -
भोले का तुक बैठाते

साँवली हवाओं में टहलते काल ने दोनों हाथों में कोक की बोतल पकड़ रखी है
परमाणु जैसी चीज किसी देश जैसी अवधरणा पर भारी है
कोई बताएगा छोटी चीज-बड़ी चीज की नौटंकी किसने-कब-कहाँ रची

स्रवन समीप के सफेद केशों की बरकत
जानने का दम भरने वाले आलोचक छटपटाते हुए प्रतिमान ढूँढ़ रहे थे
और प्रतिमान जादू से टकराकर यथार्थ पर गिर रहे थे पटापट
मरी छिपकलियाँ बिछ गईं थी चारों ओर
मोह-बलिंडा के टूटने की खुशियों के बीच
ज्ञान की आँधी की धूल आँखों में भर आई थी
टी.वी. आन था
सूचनाओं के भांडे बज रहे थे

चक्करदार सीढ़ियों से गार में उतरता हुआ
दुआ करो अकेला और गूँगा छिलके वाली रातों में
अस्त होता रवि फड़फड़ाता है
आजमगढ़ के नक्शे में इलाहाबाद
वह है, वह नहीं है, वह है नहीं है अवक्तव्य है
रास्ता कहाँ जाता है
जहाँ जाता है वहीं से आता भी है
वहीं नहीं जाता है जहाँ से लौटता है

यहीं धरीं हैं बचा ली जाने वाली चीजें
कवियों की इस प्रिय जगह पर सब कुछ है
रास्ते को छोड़कर
बाहर निकलने में मस्जिद के टूटे गुंबद का मलबा है
और इस पार नो वैकेंसी का मनुष्यताकार बोर्ड चस्पा है

चीरकर हृदय सम्राट युवा ने दिखाया
दूसरे चरण में विश्व-ग्लोब का सबकुछ नप सकेगा
रहेगा तीसरा डग भी तीसरी दुनिया में ही
जी सौ करोड़ फुट चैड़ी पीठ बनेगी
जी खूब विदेशी रोशनियाँ भी होंगी
बेडे को जर्जर देख गुरु कबीर ने मलबे वाली तरपफ उतरने की सोची
पर पीठ के 'एक्सप्रेस वे' पर पाया खुद को

कैसे कटें दिन रतियाँ
सेज की सूली है वसूली करते अमीन ने हामिद के
पुरखों को याद करते हुए
मियाँ के साथ याद किया चियाँ

अवधूत के वध उत्सव में माँगलिक वंशावलियाँ पवित्र रक्त को
गींजती हुई नंगे नरमेधों में प्रकट हुईं
नवगर्भा अँकुवाई खेती का गर्भ गिरने वाला था
उत्तेजना से हाँफ रहे थे द्विज
क्विज, यह आदम के हाथों बनी
मैं दुगुना काँप रहा था

भाँपने वाले भगीरथ ने कहा अवधूत छिन्नमाथ से
सृंगी की नोक से आत्मा से देख
उलट कटी गर्दन खेतों में उगा
रगड़ जिद कर कर जिद

हियाँ नै अइहैं हजूर
जोलहा कै जिनगी बेलकूल उलरसट्ट
ताना तानता है ताना देता है
भरनी भरती है भरन करती है
यहाँ डूब सकता है पश्चिमी सागर नैया के बीचोबीच
कंबलों की बारिश में डूब सकता है वर्ल्ड बैंक
ई धरतिया हमारी ही सिरजी हुई है
उलटबाँसी उलट जाती है यहाँ

 


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हिंदी समय में मृत्युंजय की रचनाएँ