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कविता

आदिवासी धुआँ
राजा पुनियानी


"गाँव छोड़ब नाहीं
माँ-माटी छोड़ब नाहीं
जंगल छोड़ब नाहीं
लड़ाई छोड़ब नाहीं"

उठ रहा है
खदेड़े गए पानी से
आदिवासी धुआँ

साँझ झोला में चिंता डाल कर घर लौट रहा बुधिया का निःश्वास
और सवेरे लुंगी के फेर में डर ढोकर घर छोड़ने वाली धनिया की प्रःश्वास से
धुकधुक करता है
इतिहास से भी बुजुर्ग
आदिवासी धुएँ का दिल

खदेड़े गए पानी में आग है
आग में देश
देश में आँसू है
और आँसू में घुलकर बह रहा है इतिहास के घाव का पीप

उसे पानी से खदेड़ा गया
इसी लिए पानी को ही उस ने कंधे पर उठा लिया है
धुआँ काँटों का तार पहचानता नहीं

धुआँ सत्ता द्वारा दिखाई गई संगीन देखता नहीं
धुएँ का इसीलिए कोई देश नहीं है

राजधानी का तल्ला-तल्ला सत्ता-महल की धरती चीरकर
अंधकार में अंकुरित पौधे की तरह
फैलेंगे कहा है
शताब्दी-शताब्दी दबे माथाओं ने

नोचे गए जंगल, मिट्टी, पानी और हवा ने
भेजा है जल्दी लौटने का संदेश
विकास की कैदगाह से

उसे जंगल से खदेड़ा गया
इसलिए उसने जंगल को ही कंधे पर ले लिया है

धुएँ ने उठाया है
मुस्कराते हुए प्रतिरोध की लौ
धुएँ के हाथ में अब तीर हैं, धनु है
धुएँ के झोले में किताब है, पर्चा है
धुएँ के दिल में गीत है, सपना है

खेत के टीलों-टीलों से हो के गुजरते हुए
गाता जा रहा है न सोए हुए गाँव का एक आदिवासी धुआँ -
"गाँव छोड़ब नाहीं
माँ-माटी छोड़ब नाहीं
जंगल छोड़ब नाहीं
लड़ाई छोड़ब नाहीं"

और अभी पानी की आग हौले से
आकाश की तरफ उठती जा रही है
उसी आग में जल रही है तप-तपकर
राज्यसत्ता की शाही चाल

उसे पृथ्वी से खदेड़ा गया
इसीलिए उस ने पृथ्वी को ही कंधे पर उठाया है

(अनुवाद कवि द्वारा स्वयं)

 


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