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कविता

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अरुण कमल


पहले एक किताब की दुकान पर काम पकड़ा
हफ्ते-भर रहा फिर बैठ गया
बोला, मन नहीं लगा;
जब रात भर पेट गुड़गुड़ाया तो फिर एक प्रेस में लग गया
और कोई दस दिन बाद मुझे मंदिर की सीढ़ियों पर मिला
मालिक जल्लाद था, बोला;
तब विद्यार्थियों के लिए टिफिन ढोने लगा बाँस के डंडे पर
और चौथे ही दिन अंडा चुराने के इल्जाम में वापस
सड़क पर;
फिर एक कूरियर सर्विस में घुस गया
और भूत की तरह बारह दिन सायकिल रौंदने और
सैंकड़ों घंटियाँ बजाने के बाद
उसे अचानक लगा कि वह सिर्फ खुराकी पर खट रहा है
तो एक दिन मय चिट्ठियों के चंपत हो गया;
फिर तो कई काम किए, छोड़े, किए छोड़े
मारा-मारा फिरा एक दो बार घायल भी हुआ पता नहीं कैसे,
एक दिन अस्पताल में मिल गया पड़ा-पड़ा
खिड़की से पुकारा
पर प्यारे ने हिम्मत नहीं हारी
हाथ-पाँव मारता रहा
आखिर एक दिन दारू-भट्टी में जुगाड़ लगा
और वहाँ टिक गया
शरीर भी अब गोटा गया
फट से दो-दो कमीजें खरीदीं, एक सफेद एक धारी वाली
एक काला चश्मा
और एक कैप जिसे कालेजिया लड़कों की तरह उल्टा पहनता
और एक दिन लड़की भी देख ली रिश्ते में
तभी एक दिन देखा मैंने
पटने के अशोक राजपथ पर
अगल-बगल सिपाही
कमर में रस्सा!

 


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हिंदी समय में अरुण कमल की रचनाएँ