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कविता

स्वप्न
अरुण कमल


वह बार-बार भागती रही
ज्यों अचानक किसी ने नींद में पुकारा
कभी किसी मंदिर की सीढ़ी पर बैठी रही घंटों
और फिर अँधेरा होने पर लौटी

कभी किसी दूर के संबंधी किसी परिचित के घर
दो-चार दिन काटे
कभी नैहर चली गई
हफ्ते-माह पर थक कर लौटी
हर बार मार खा कर भागी
हर बार लौट कर मार खाई
जानती थी वो कहीं कोई रास्ता नहीं है
कहीं कोई अंतिम आसरा नहीं है
जानती थी वो लौटना ही होगा इस बार भी

गंगा भी अधिक दूर नहीं थी
पास ही थीं रेल की पटरियाँ
लेकिन वह जीवन से मृत्यु नहीं
मृत्यु से जीवन के लिए भाग रही थी
खूँटे से बँधी बछिया-सी जहाँ तक रस्सी जाती, भागती
गर्दन ऐंठने तक खूँटे को डिगाती

वह बार-बार भागती रही
बार-बार हर रात एक ही सपना देखती
ताकि भूल न जाए मुक्ति की इच्छा
मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न
बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न

 


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