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कविता

वृथा
अरुण कमल


जब उम्र कम थी
                  काले थे केश और आभा थी
                        पर मैं दुबला था बहुत
फिर उम्र बढ़ी
           शरीर गोटाया आँखों को थाह मिली
           पर कहाँ कैसे निबहना आता न था
अब जब उम्र हुई
                  जानता हूँ दाँव-पेंच शास्त्र कुल
            पर साथ नहीं देह न थाह न आभा

कभी कच्चा कभी डंभक कभी पुलपुल।

 


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