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कविता

दाना
अरुण कमल


वह स्त्री फँटक रही है गेहूँ
दोनों हाथ सूप को उठाते-गिराते
हथेलियों की थाप-थाप्प
और अन्न की झनकार
स्तनों का उठना-गिरना लगातार -
घुटनों तक साड़ी समेटे वह स्त्री
जो खुद एक दाना है गेहूँ का -
धूर उड़ रही है केश उड़ रहे हैं
यह धूप यह हवा यह ठहरा आसमान
बस एक सुख है बस एक शांति
बस एक थाप एक झनकार।

 


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