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कविता

निर्बल के गीत
अरुण कमल


1.

हर रात डर लगता है
कोई भारी पत्‍थर मुझे दबाने लगता है
साँस फँसती है
दूर लगता है कहीं नगाड़ा बज रहा है
किसी को वे ले जा रहे हैं बलि के लिए
इतना सन्‍नाटा है चारों तरफ इतनी धुंध
कभी भी कोई भी खबर आ सकती है
मैं जी रहा हूँ एक एक साँस गिनता
अभी अगले पल कुछ भी हो सकता है
मेरी नाव डूब रही है मेरा घर गिर रहा है
मेरा रास्‍ता रसद पानी बंद
मेरे पैरों के नीचे फट रही है धरती
मैं डूब रहा हूँ


2.

मुझे इस तरह अकेला मत छोड़ो
रुको मैं भी तैयार हो लूँ
बस चप्‍पल डाल लूँ
नहीं मैं नंगे पाँव चल रहा हूँ
रुको तो मुझे छोड़ो मत
बाहर से ताला मत दो
मुझे खोल दो मुझे भी चलने दो वहाँ
जहाँ सब जा रहे हैं
किसलिए बचा रहूँगा मैं इस सुनसान घर में
किसकी याददाश्‍त


3.

इससे ज्‍यादा दखल मैं चाहता भी नहीं
जितना पानी का पेड़ में ओस का दूब में
जो हवा का शाखों में नभ का नदी में
उतना ही दखल जितना किराएदार का घर में
तुम तो पानी हो तुम हवा तुम नभ
तुम एक घर
बंद मत करो द्वार
नहीं इस रात मत छोड़ो शीत में
बाहर


4.

नहीं मुझे ढूँढ़ना मत
रात भर यदि घर न लौटूँ
कोई खोज इश्‍तहार मुनादी नहीं
अगर मैं हफ्ता दस दिन घर न लौटूँ
कोई काम रोकना मत
शाम को भी कभी इंतजार नहीं
समझना मैं हूँ कहीं न कहीं
जैसे दुनिया में इतने लोग हैं जिन्‍हें हम जानते नहीं
और जो नहीं हैं उन्‍हें भी हम कहाँ खोजते
नहीं मुझे ढूँढ़ना मत
मैं कभी खोऊँगा नहीं
मैं वहीं धूल में दबे सिक्‍के सा
कभी अचानक चमक उठूँगा चाँद रात में


5.

कोई कुछ नहीं देगा
एक शाम भोजन भी नहीं रात भर आसरा तो दूर
जब तुम सब कुछ खोकर खाली हाथ
अपने ही घर लौटोगे शाम को
तब पाओगे वह तुम्‍हारा घर नहीं
गली के कुत्‍ते भी भूँकेंगे तुम पर
किसी दोस्‍त को पुकारोगे वह मुड़ेगा और आगे चल देगा
इस चलती चक्‍की से छिटक जो दाना
बाहर गिरा वह फिर बाहर ही बिलखेगा
जो बचा रहा भीतर वह पिसेगा गात्र गात्र


6.

किसी से कोई उम्‍मीद नहीं
न आसरा है किसी सहारे का
ये हाथ भी न रहें ये पैर भी
आँखें न रहें न कान न जीभ
बस साँस रहे तब तक जानता हूँ
जीता रहूँगा
उस पेड़ की तरह जिस पर ठनका गिरा
उस कुत्‍ते की तरह जिसकी देह में खौरा है
उस पक्षी की तरह जिसके पंख झड़ रहे हैं
मैं एक टूटी सड़क की तरह जिंदा रहूँगा
एक सूखी नदी की तरह अगले आषाढ़ तक

 


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