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संस्मरण

कवि बच्चन जब मेरे घर से मिलने आए
दिविक रमेश


यूँ तो बच्चन जी को अनेक बार देखने-सुनने का अवसर मिला - दिल्ली में लेकिन उनमें से कुछ मुलाकातें और उनकी यादें ऐसी हैं कि कभी नहीं भूलतीं। न केवल कभी नहीं भूलतीं बल्कि हमेशा सदाबहार प्रेरणा बनी रहती हैं। उन्हीं के कारण बच्चन जी से आत्मीय भाव भी बहुत मिला।

बात शुरू करता हूँ तब की जब बच्चन जी से मेरा कोई व्यक्तिगत वास्ता नहीं पड़ा था। बच्चन जी तब मुंबई (उस समय बंबई) स्थित अपने पुत्र अमिताभ बच्चन के घर 'प्रतीक्षा' में रह रहे थे। एक दिन वहीं से एक पत्र आया। भव्य लिफाफे में। प्रेषक के रूप में 'प्रतीक्षा' का पता था और बच्चन जी का नाम भी। उन दिनों मैं अमर कॉलोनी, लाजपत नगर, नई दिल्ली में किराए के मकान में रहता था - दो कमरों का घर था। डाक ज्यादा आने के कारण डाकिया मेरे नाम से भली भाँति परीचित था। वह यह भी जानता था कि मैं कविता आदि लिखता हूँ। डाकिया 'बच्चन' जी की चिट्ठी लाया तो काफी उत्तेजित था। कह रहा था - 'देखिए-देखिए 'बच्चन' जी ने आपको चिट्ठी भेजी है। मुझसे कहीं ज्यादा वह खुश लह रहा था। चिट्ठी को हाथ में ऐसे पकड़े हुए था जैसे कोई पूरा हो गया नायाब सपना हो। खैर मैंने लिफाफा ले लिया। गनीमत थी कि डाकिया ने बख्शीष नहीं माँगी। अगर माँगता तो मैं दे भी देता। भले ही जाहिर न की हो, खुशी तो मुझे भी कम न थी। एक तो पहली बार हरिवंश राय 'बच्चन' जैसे बड़े कवि ने पत्र लिखा था - मुझे, जो कि उस समय यशःकामी कवि-लेखक था। दूसरे उस पत्र का मजमून भी अद्भुत था। पहली ही पंक्ति अद्भुत, प्रेरणादायी और मानवीयता की मानक थी। पत्र दिनांक 26-1-1978 में लिखा था - 'बिना पूर्व परिचय के पत्र लिख रहा हूँ। क्षमा करेंगे। आशा है मेरे नाम और मेरी यत्किंचित कृतियों से आप अपरिचित न होंगे। यह पत्र एक विशेष कार्य से। हिंद पाकेट बुक्स के लिए मैं १९७६-७७ में प्रकाशित प्रतिनिधि-श्रेष्ठ कविताओं का एक संकलन तैयार कर रहा हूँ। आपके कृति 'रास्ते के बीच से' तीन रचनाएँ लेना चाहता हूँ। १. कविता : एक निर्णय २. उत्ताराधिकारी के नाम ३. बोध। अनुमति देकर आभारी करेंगे। पारिश्रमिक आदि के लिए प्रकाशक आपसे संपर्क करेंगे। शेष सामान्य। शुभकामनाएँ। आपका बच्चन।"

इस पत्र के माध्यम से जब पता चला कि वे हिंदी की प्रतिनिधि कविताओं का एक संकलन अपने संपादन में तैयार कर रहे थे और मेरी कविताओं के पहले और उस समय तक एक मात्र कविता संग्रह 'रास्ते के बीच' से अपनी पसंद की कुछ कविताएँ उक्त संकलन में सम्मिलित करना चाह रहे थे और मुझसे अनुमति चाही थी तो मेरी मनःस्थिति क्या रही होगी, समझी जा सकती है। जिसके नाम से डाकिया भी परिचित था वह मुझ जैसे हिंदी के युवा कवि और अध्यापक को लिख रहे थे, 'आशा है मेरे नाम और मेरी यत्किंचित कृतियों से आप अपरिचित न होंगे।' खैर मैंने उत्तर दिया - भावुकता तो उसमें रहनी ही थी सो रही भी। यह पत्र अंततः 'तिनके का सहारा' बना या दूसरे शब्दों में कहूँ तो उँगली बना जिसे थाम कर मैं बच्चन जी के काफी निकट पहुँच गया। बाद में पता चला था कि बच्चन जी को मेरा संग्रह धर्मवीर भारती से प्राप्त हुआ था जिन्हें मैंने भिजवाया था।

अब जब भी बच्चन जी दिल्ली आते तो पूर्व सूचना दे देते। और यूँ उनसे मिलने का अवसर मिल जाता। एक दो भेंटों की स्मृति तो जरूर ऐसी है कि किसी को भी भागीदार बनाने का मन करता है। लेकिन, पहले उनके एक अन्य पत्र और उसके संदर्भ को जरूर बताना चाहूँगा। सातवें दशक के अंत का समय था। प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविता संकलनों की कड़ी में बच्चन जी आठवें दशक की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन तैयार कर रहे थे। उन्होंने लिखा कि मैं उनके साथ संकलन का दूसरा संपादक रहूँ। उनके आकलन और उनकी रुचि पर मैं चकित था। बहुत ही सुखद पत्र था। बच्चन जी के साथ संपादक बनने का दुर्लभ अवसर था। लेकिन फिर ध्यान में आया कि इस संकलन में मेरी भी कविताएँ होंगी। ऐसा लगेगा कि जैसे मैंने अपने संपादक होने का फायदा उठा लिया। निखालिश किसी और बड़े साहित्यकार के संपादन में प्रकाशित होने का जो महत्वपूर्ण अवसर होता है उससे वंचित रह जाऊँगा। दूसरे, उन्हीं दिनों मैं स्वयं आठवें दशक की कविताओं का एक संकलन 'निषेध के बाद' अपने संपादन में तैयार कर रहा था। खैर ज्यादातर पहले कारण से मैंने बहुत ही विनम्रता के साथ बच्चन जी को लिखा कि आप जैसे बड़े साहित्यकार के साथ संपादन करने योग्य मैं अभी नहीं हूँ। बच्चन जी तो बच्चन जी थे। उत्तर दिया - हाँ अब मुझ बूढ़े के साथ काम करना क्यों अच्छा लगेगा। खैर संकलन का संपादन बच्चन जी के साथ अजित कुमार ने किया। उनके पत्र से पता चला था कि वे मुझे इसलिए साथ रखना चाहते थे क्योंकि उन्हें मैं गुटबाजियों और दलबंदियों से ऊपर लगा था। उन्होंने मुझे सही ही पहचाना था। उनका वह पत्र बच्चन रचनावली-9 के पृष्ठ 392-393 पर प्रकाशित है। बंबई (मुंबई) से लिखे पत्र दिनांक 5.4.80 का एक अंश इस प्रकार है - "...क्यों न हम दोनों मिलकर यह काम करें। अजित को मैंने अपने साथ रखना चाहा था, उन्हें भी शामिल कर लें। संकलन हम तीनों के नाम से जाय। मैं किसी स्कूल-गुट-दल से आबद्ध नहीं, अजित भी नहीं है और शायद आप भी नहीं हैं। हम एक स्वस्थ मानदंड बनाकर दशक की कविताओं को परखें, हममें सहमति होना कठिन नहीं होना चाहिए। ...फिर भी यदि आपको किसी प्रकार का संकोच हो तो आप मेरे प्रस्ताव को अस्वीकार कर सकते हैं। कारण बताने को आप बाध्य नहीं। ...घर में सबको और घर को भी मेरा यथायोग्य। 'घर को भी ' का एक विशिष्ट संदर्भ है जो बहुत ही आत्मीय है।

लौटता हूँ। भेंट पर। 1980 की बात है। सूचना मिली कि वे डिफेंस कॉलोनी के अपने एक मित्र के यहाँ ठहरेंगे। वह स्थान मेरे निवास से लगभग 2-3 किलोमीटर के दायरे में रहा होगा। मैं तो मिलने को उत्सुक था ही, इस बार पत्नी और उससे भी ज्यादा बेटे सौरभ ने मिलने की इच्छा व्यक्त की। बेटी दिशा तब बहुत छोटी थी। मैंने बच्चन जी को फोन किया। उन्होंने शाम की ओर एक घंटे का समय दिया। पता था कि समय के बारे में बच्चन जी का कड़ा अनुशासन था। एक घंटे का मतलब एक घंटा। और वह भी दिए गए समय के अनुसार। मैंने थोड़े संकोच के साथ कहा - 'बच्चन जी इस बार पत्नी और बेटे का भी मन है आपसे मिलने का, कहें तो ले आऊँ?' बच्चन जी का उत्तर था - 'ले आओ। लेकिन बेटा मुझसे नहीं अमिताभ के पिता से मिलना चाहता होगा।' मैं हँसा और वे भी।

ठीक समय पर हम उनके पास थे। काफी आवभगत हुई। लेकिन मैं बच्चन जी के व्यवहार पर दंग था। उन्होंने घंटे में से केवल 15-20 मिनट मुझे और मेरी पत्नी को दिए होंगे, शेष समय बेटे को दिया। न जाने क्या-क्या दिलचस्प बातें करते रहे। अमिताभ जी की एक्टिंग के बारे में, उनके बाल कटवाने के बारे में, इत्यादि। हम मूक श्रोता थे। बच्चन जी पूरे तरह रम गए थे और बेटा उनकी बातों में खो चुका था। इसी बीच उन्होंने बेटे से अमिताभ जी की शूटिंग दिखाने का वायदा भी किया। और बाद में उसे पूरा भी किया। पृथ्वीराज रोड की कोठी में शूटिंग हुई थी। बच्चन जी ने एक स्लिप दी थी अमित जी के लिए जिसे देखकर दरबान ने बंद दरवाजे खोल दिए थे और एक भारी भीड़ को पीछे छोड़कर हम अंदर पहुँच गए थे। वहाँ जया जी भी थीं, देवन वर्मा थे और अमिताभ जी भी - मेकअप में। खैर। बच्चन जी की ढेर सारी दिलचस्प बातें सुनकर बेटा मुग्ध था। और हम मुग्ध थे बच्चन जी के बच्चों से घुल-मिल जाने के स्वभाव पर। बता दूँ कि बच्चन जी की बाल-कविताओं की भी तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं। चलने लगे तो दिल से भी और औपचारिकता के रूप में भी मैंने बच्चन जी से घर आने का आग्रह किया। आग्रह में, जाहिर है, मेरी पत्नी ने भी साथ दिया। बच्चन जी बोले, जैसा ऐसे आग्रह पर कोई भी बड़ा आदमी बोलेगा, 'इस बार तो काफी व्यस्तता है। परसों बंबई लौटना ही है। अगली बार आऊँगा तो आपके घर भी आऊँगा... और फिर आप सब तो मिल ही लिए हैं।' पता नहीं कैसे मेरे मुँह से निकला - 'पर घर तो नहीं मिला न बच्चन जी। घर को भी प्रतीक्षा होती है।' सुनकर बच्चन जी ने कहा - 'अगली बार जरूर आऊँगा। पर यह निश्चित है कि तुम एक कवि हो।'

और हम आनंद का ऐहसास लिए घर लौट आए। बेटा भी खुश था। कभी मैंने बच्चन जी की पुस्तक 'जाल समेटा' की समीक्षा की थी जो नरेंद्र कोहली द्वारा संपादित पत्रिका अतिमर्श में छपी थी। पुस्तक में बच्चन जी ने फ्री वर्स में लिखी कविताएँ दी थीं। मुझे लग रहा था कि उस समीक्षा को करते समय मैं थोड़ा पूर्वाग्रही हो गया था। लाख उत्तर आधुनिकता और कविता के 'पाठ' की बात कर ली जाए लेकिन रचनाकार के व्यक्तित्व और उसके निर्माता परिवेश की गहरी जानकारी उसकी रचना को समझने में मदद ही करती है। क्योंकि आधा-अधूरा ही सही, रचना का एक संदर्भ हाथ लग जाता है। स्वाभाविक था कि सोने से पहले तक, हममें, बच्चन जी से सुखद भेंट की चर्चा होती रही और हम स्मृति-आनंद में डूबे रहे।

सुबह-सुबह, हर सुबह की तरह बेटे को स्कूल-बस में चढ़ाने के लिए, घर से थोड़ी दूर, बस-अड्डे पर गया। बस आई और मैंने बेटे को चढ़ाया ही था कि देखा हमारे पड़ोसी का बेटा दौड़ता बल्कि लगभग हाँफता हुआ मेरे निकट आया और बोला - 'अंकिल, अंकिल, जल्दी घर चलिए। आपके घर अमिताभ के पिता जी आए हैं।'

'हैं? इतनी सुबह'। शपथ खाकर कह सकता हूँ कि मैं पूरी तरह हैरान था। अविश्वसनीय लग रहा थी वह सूचना। फिर भी मैं घर की ओर लगभग दौड़ रहा था। पहली मंजिल पर अपने घर मैं बिजली की गति से चढ़ गया था। बैठक में बच्चन जी आराम से सोफे पर बैठे थे। पत्नी, श्रीमती प्रवीण शर्मा (अब डॉ. प्रवीण शर्मा जिन्होंने बच्चन जी के ही काव्य पर, बाद में, दिल्ली विश्वविद्यालय से, पी.एच.-डी. की उपाधि के लिए शोध-ग्रंथ लिखा और जो प्रकाशित है। और यह भी कि शोध की निर्देशिका प्रो. निर्मला जैन थी तथा बच्चन जी पर दिल्ली विश्वविद्यालय से होने वाला यह पहला शोध था। और बच्चन जी पर शोध करने के एक प्रेरक त्रिलोचन जी भी थे।) चाय आदि के प्रबंध में तल्लीन थीं।

मैं खुश, ...नहीं, अद्भुत रूप से खुश... नहीं - पता नहीं कैसा, पर खुश था। पूछा - 'बच्चन जी आप... इतनी सुबह?'

'हाँ, तुम्हारे एक वाक्य के भाव के कारण तुम्हारे जाने के बाद सोचता रहा और तुम्हारा वह वाक्य 'घर को भी प्रतीक्षा होती है' मुझे कचोटता रहा। सोचा बूढ़ा हो चला हूँ। कब क्या हो जाए। और तुम्हारे घर से मिलना न हो पाए जिसे मेरी प्रतीक्षा है। सो टैक्सी ली और पता पूछते हुए सुबह सुबह चला आया तुम्हारे घर से मिलने।'

सच कहूँ, मैं तो, ऐसे उत्तर और व्यवहार की कल्पना भी नहीं कर सकता था। यूँ भी घर पर आने की बात मेरे मुँह से सहज ही रूप में निकली थी।

लगभग दो घंटे रहे बच्चन जी हमारे घर। कितनी साहित्यिक बातें हुई। दुर्भाग्य, कि कोशिश के बावजूद, टेप-रिकार्डर पूरी बात रिकार्ड नहीं कर पाया। एक पूरा साहित्यिक परिदृश्य और साहित्य संबंधी चिन्ताएँ एवं चिंतन सप्रमाण प्रस्तुत हो गया होता। लेकिन उनकी दो बातें आज भी याद हैं - एक तो यह कि किसी भी रचनाकार के निज को जान लेने के बाद उसकी रचना के अर्थ बदल सकते हैं और काफी हद तक सही रूप में उपलब्ध हो सकते हैं। दूसरी यह कि जब तक वे पत्र का जवाब नहीं दे लेते, मेज पर रखा वह, पत्र कहता रहता है उत्तर देने को और वे इसीलिए अनिवार्य रूप से हर पत्र का उत्तर देने को बाध्य होना पड़ता है। हाँ, कभी-कभार डायरी लिखने की आदत है। डायरी के अनुसार बच्चन जी मेरे घर पर 25.3.80 को आए थे। सुबह 7.15 पर। बहुत ही अनौपचारिक लगे। बच्चन जी ने कहा था कि उनके मत में अज्ञेय, शमशेर, पंत और महादेवी जीवन के कवि नहीं हैं। अज्ञेय द्वारा स्थापित वर्सल संस्था के प्रति भी उनकी कोई दिलचस्पी नहीं लगी। उन्होंने यह भी बताया कि वे घर को कविता से भी पहले महत्व देते हैं। मसलन पत्नी बीमार हो तो कविता लिखने को प्राथमिकता नहीं देंगे।

अर्थात जीवन का महत्व कविता से ऊपर है। कविता वे शिल्प के प्रति सचेत होकर नहीं लिखते। सहजता में विश्वास है। इत्यादि।

बच्चन जी का यह रूप मेरे लिए अत्यंत प्रेरक था। और आज भी है। इस घटना का संक्षिप्त वर्णन मेरी पुस्तक 'फूल भी और फल भी' में भी उपलब्ध है। पुस्तक खासकर बच्चों के लिए है।

अभी बच्चन जी के व्यक्तित्व का एक और सशक्त पक्ष सामने आना था। एक अंतराल के बाद एक पुस्तक हाथ लगी - 'जिज्ञासा मेरी समाधान बच्चन के' (किताबघर, 1986)। लेखक हैं डॉ. कमल किशोर गोयनका। उस पुस्तक में (पृष्ठ 105-106 पर) जिस ढंग से उक्त 'घर' संबंधी घटना और मेरा उल्लेख किया गया है वह कम से कम, मेरे लिए तो एक अद्भुत अनुभव है। बच्चन जी ने घर को भी प्रतीक्षा होती है कहे मेरे कथन को याद करते हुए उस समय के मुझ युवा कवि की कविता और मुझमें महत्वपूर्ण कवि के रूप में उभरने की सम्भावनाएँ देखी थी। यूँ बच्चन जी ने बंबई (मुंबई) पहुँचने के बाद 30.3.80 को ही एक पत्र लिख दिया था जिसमें 25.3.80 को मेरे घर आने के संदर्भ में भी बहुत ही आत्मीय और प्रेरक ढंग से लिखा था। उनके शब्द थे - "आपके एक वाक्य ने मुझे विवश कर दिया कि मैं आपके घर आऊँ। मैंने कहा - आप सब लोग तो यहीं आ गए, अब घर क्यों आना है। आपने कहा - 'घर' भी तो आपकी प्रतीक्षा में है! आशा है 'घर' मुझसे निराश नहीं हुआ

...श्रीमतीजी को नमस्कार - बच्चों को आशीष - 'घर' को भी।' 'घर' को लेकर उनकी संजीदगी मेरे लिए एक बहुत ही प्रेरक अनुभव था।

कहते हैं, मुँह देखी तो कोई भी प्रशंसा कर सकता है लेकिन प्रशंसा पीठ पीछे भी की जाए तो ज्यादा प्रामाणिक एवं महत्वपूर्ण होती है। बच्चन जी का सही रूप सामने था। उनका यही रूप 1983 में भी देखने को मिला था, जब मुझे हरिद्वार से अपने एक मित्र कमलकांत बुधकर जी का पत्र, दिनांक 16.3.83 मिला। लिखा था - "खुली आँखों में आकाश' के प्रकाशन के लिए बधाई लें! कृपया लिखें कि कहाँ से प्रकासित है। मुझे कल पूज्य बच्चन के पत्र से पता चला। उन्होंने उसकी तारीफ करते हुए संग्रह पढ़ने की सलाह दी है। उन्होंने लिखा है कि हमारी भाबी यानी श्रीमती दिविक रमेश ने उक्त संग्रह उन्हें गार्गी कालेज में बुलाकर भेंट किया। संग्रह प्राप्ति को ही उन्होंने गार्गी कालेज में जाने का एकमात्र लाभ लिखा है। अस्तु, अब आपकी कृपा से यह लाभ मुझे भी मिले तो है!'

असल में बच्चन जी 'गार्गी कॉलिज में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए गए थे और मैंने पत्नी ( जो वहाँ पढ़ा रही थीं) के हाथों अपने, हाल ही में प्रकाशित दूसरे कविता-संग्रह 'खुली आँखों में आकाश' की प्रति उनके लिए भेजी थी। मुझे याद आ रहा है कि बच्चन जी ने 'खुली आँखों में आकाश' पढ़ने के बाद मुझे भी एक पत्र लिखा था 6.3.83 को जिसमें कवि नागार्जुन के बारे में भी एक बात थी जिसे उन्होंने न खोलने के लिए कहा था। सोचता हूँ कि आज उस पत्र के अंश यहाँ रख दूँ - "कल गार्गी कालेज गया था। आपकी पत्नी ने वहाँ आपकी नई कृति दी--खुली आँखों में आकाश' - बहुत धन्यवाद। पढ़ भी चुका हूँ। मुझे पंख, माँ, रामसिंह, पुन्न के काम आए हैं, मिट्टी का मर्म, कृतज्ञता, चिड़िया का ब्याह, बया का घोसला, खूबसूरत कविता, शमशेर की कविता बहुत पसंद आईं। सोचने लगा अगर मुझे कभी 'प्रतिनिधि-श्रेष्ठ कविताएँ के लिए उनमें से चुनना पड़ा तो इन्हें चुनूँगा - अगर केवल दो ही मुख्य हो तो 'मिट्टी का मर्म' और 'कृतज्ञता' को। व्यक्ति और समष्टि दोनों की मार्मिक अनुभूतियाँ आपकी कविता में बड़ी सूक्ष्मता और संकेतिकता के साथ व्यक्त होती है। तथाकथित प्रगतिशील इस कलात्मक संयम को भुलाकर भोंडे हो जाते हैं। उनमें, क्षमा करेंगे, मैं नागार्जुन को सबसे बड़ा अपराधी मानता हूँ। वैसे उनमें ...कवित्व-प्रतिभा है जिसका उपयोग वह नहीं करते हैं। कृपया उनसे कहें मत।"

एक और स्मृति है। बच्चन जी के आत्मीय व्यक्तित्व को खोलती। पर इसके लिए भी डायरी का सहारा लेना पड़ रहा है। बात 24.11.80 की है। सायं 5.30 से 8.00 बजे के बीच की। स्थान दिल्ली स्थित पाँच सितारा होटल ओबराय का कमरा नंबर 346 । सदा की भाँति इस बार भी डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी ने अपने पत्र दिनांक 18.12.80 के द्वारा बंबई (मुंबई) से दिल्ली आने की सूचना दे दी थी। उनके दिल्ली पहुँचने के दो दोनों के बाद फोन पर उनसे आज (24.111.80 को) होटल (ओबराय में) शाम को मिलना तय हो गया था। श्याम विमल के साथ उनसे मिलने होटल गया। कमरे की घंटी बजाने के बाद बच्चन जी ने दरवाजा खोला। श्याम विमल का उनसे परिचय करा दिया। हल्के-हल्के गर्म और खूबसूरत कमरे में हम अलग-अलग कुर्सियों पर बैठ गए। बच्चन जी ने परिवार का हल-चाल पूछा। बताया कि 'सिलसिला' फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में अमिताभ, जया आदि सभी लोग आए हुए हैं। इसके बाद साहित्यिक और फिल्मी परिवेश की बातों पर चर्चा चल निकली। बच्चन जी ने बताया कि जहाँ तक उनके गीतों का सवाल है उनकी प्रक्रिया खास है। पहले एक लय (रिदम) कौंधती है और फिर वही खास धुन पूरे गीत या कविता का मीटर भी तय कर देती है। उन्होंने बताया कि संगीत की उन्होंने कभी विधिवत शिक्षा नहीं ली, तो भी अलग-अलग धुनें उन्हें मिलती रही हैं। उन्हें अपने गीतों को किसी और की लय में बांधना अपने गीतों की हत्या लगती है, क्योंकि वैसी स्थिति में वह 'इन्टेंस' (भावप्रवणता) नहीं आ पाती जो वे व्यक्त करना चाहते हैं। इधर-आँखों की वजह से उनका लिखना-पढ़ना कम हो गया है। रचनात्मक लेखन वे बोल कर लिखाने या किसी अन्य माध्यम की प्रक्रिया से नहीं कर सकते। बात जैनेंद्र जी के बारे में चल निकली तो उन्होंने एक दिलचस्प किस्सा सुनाया हालाँकि यह भी कहा कि उसका उनके पास कोई प्रमाण नहीं है। बताया कि जैनेंद्र जी अपने सेक्रेटरी (सचिव) से कहते कि एक शब्द बोलो। मानो शब्द बोला - 'छाता', तो जैनेंद्र जी उस शब्द को लेकर कहानी शुरु कर देंगे। अगले दिन दूसरे शब्द से कहानी को आगे बढ़ा लेंगे।

बातचीत के बीच में ही पहले उनकी पत्नी तेजी जी आईं जिनसे उन्होंने हमारा परिचय कराया। इसके बाद अमिताभ जी के बच्चे श्वेता और अभिषेक आए। बाद में जया बच्चन और शम्मी नाम की एक अभिनेत्री आईं। शम्मी को हमारे न पहचानने पर बच्चन जी को आश्चर्य हुआ।

हमरे आग्रह पर, बच्चन जी ने मधुशाला के कुछ अंश तथा अपने गीतों के कुछ भाग गा कर सुनाए। अनुमान लगाया जा सकता है कि वातावरण कितना भीगा-भीगा और सुकून से भर गया होगा। बच्चन जी से वह औपचारिक अनौपचारिक मिलन हमेशा के लिए हमारी धरोहर बन चुका था।

यादें तो और भी बहुत सी हैं। खासकर उनके दिल्ली स्थित घर 'सोपान' में श्री कैलाश खोसला के साथ हुई भेंट की। पर फिर कभी।


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