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कविता

जमील हुई जमीन से
प्रेमशंकर मिश्र


उस दिन
नीरन ने फिर से याद दिलाया
आकाश एक नहीं होता।
ऊँचाइयाँ
लपक-लपक कर
कुछ छू लेने की
निरंतर उलझती हुई ललक
छूते-छूते रह जाने की
रोमाकुल स्‍वप्‍नदंशी कसक
जैसे-जैसे
जो कुछ भी
सिर पर छाती जाती है
वही तनाव
वही फैलाव
वही लगाव
वही धुन
वही गान
वही गुनगुन
वही टुनफुन
उसका अपना आकाश होता है।

धूल में
कलैया मारती गोरैये की
थक्‍के-थक्‍के थमे बादल
से
नजर लड़ाना
उँगलियों की पोर में
दबी फँसी कंकड़ी का
अपना अकिंचन अपनापन खोकर
गर्वीली झील को

आपदा मस्‍तक
ढनढना देना
टिटिहरी-सागर संवाद
ध्रुव-प्रहलाद
सबका हासिल
बस यही तो
कोई नेह जलाएँ
कोई बाती उकसाए।

कगार पर
बने बसे घर घरौंदे से
एक गुड़िया
रोज कागज की नाव बनाती है
सहेली लहरो से
बतियाते बतियाते
फुदकते सूरज से
बिदकते सूरज तक घुटनों-घुटनों पानी में
पाँव हिलाते
खिलौने से भरीपुरी
वापसी का इंतजार करती है
उसे यकीन नहीं होता
माँ मर चुकी है।

मेरे भाई
ऐसे ही में तो
आस्‍थाओं के पाँव भारी होते हैं
कुछ न होते हुए भी
सब कुछ हुआ-हुआ दिखता है।

यह जरूरी नहीं
कि सारे मतलब के शब्‍द
कोश में हों ही
सच तो यह है

कि कोश तक आते-आते
शब्‍द अपनी उमर खो देते हैं
क्‍या ऐसा नहीं है
कि लोग
जब कुछ नहीं कर पाते
रो देते हैं?

भँवर कहीं
भाँवर कहीं
कांधा कही
काँवर कहीं
कभी 'हाँ'
कभी 'नहीं'
सुविधा कम
द्विविधा कम
विसंगति की यही संगति
हमारी गति है नियति है
जमीन से जुझने वाले को
आसमान की बातें नहीं करनी चाहिए
ऐसा किताबों में लिखा हैं
जो कुछ दिख है
वही उसकी व्‍याख्‍या है
हर ऐसे क्षणों की
यही आख्‍या है।

 


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