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कविता

तुम्हारे शहर में
प्रेमशंकर मिश्र


कितना अकेला होता रहा हूँ
तुम्‍हारे इस शहर में।
और तो और
लोग कहते है
तुम्‍हारा भी व्‍यवहार
कुछ इस प्रकार का है
जैसे टूटे आईने में
अपने चेहरे को
अपने ही हाथों
कई टुकड़ों में बाँट देना।
ठीक भी है
जूड़े का फूल
जब आँचल का काँटा बन जाए
रास्‍ता बदलना ही अच्‍छा होता है।

तुम्‍हारे शहर में
लोग गंध का सौदा करते हैं
मजबूरियों के दाम लगते हैं।
और मित्र!
तुम्‍हें भी तो आखिर यहीं रहना है
घर से लेकर आकबत तक सँवरना है
तुम्‍हारे विवेक

लाखों में है एक
सपने जब पनपने लगें
तब
एक दो तीन
आखिर कब तक लोग अपने लगें।
धार के साथ सरकना ही जिंदगी है
किनारों पर बड़ी गंदगी है
यह बात और है
कि जब तक पानी का भाव न लगे
करारों में लिपटे रहना ही बुद्धिमत्‍ता है
तुम्‍हारा शहर जादू का कलकत्‍ता है।
हँसता बोलता
सजता सँवरता
सहाने से लेकर जोगिया तक
नित नए रंग बदलता
तुम्‍हारा शहर
आजकल
मुझे देखते ही क्‍यों बुझ जाता है
मेरा तो अब केवल आँखों का ही नाता है।
मेरे दोस्‍त!
जिंदगी के इस अनमोल बरसों में
तुम्‍हारा किस-किस का एहसान मानूँ
रह-रह कर आती धूप छाँव का
तुम्‍हारे हर दाव का
कि उस महावरी पाँव का
आती-जाती बरातों का
ठोकरों का, लोतों का
उन दिनों का, रातों का
बच्‍चे बूढ़े
नात रिश्‍तेदारों की घातों का।
सचमुच
तुम्‍हारे शहर की हर गली
मेरे लिए एक नया मोड़ है
ओह!

इन हरी-हरी ताँतों में कितना मरोड़ है!


तुम्‍हारे शहर में
आग पर वर्फ जमाई जाती है
हर छोटी मोटी खरोंच
घटाई-बढ़ाई जाती है
अभिव्‍यक्ति के साथ
इधर दिन प्रतिदिन
विश्‍वासों का भी रोना है
पता नहीं
यह सरकार का कौन सा टोना है
कि
जानते पहचानते हुए भी
यह पीतल की अनबोलती मुस्‍कान
हमारे लिए दमकता सोना है।

तुम्‍हारे शहर की सबसे वफादार हमदर्द
एक नागिन रेखा है
जो कभी कभार खुश होकर
मेरे होठों को डसती है
बस सिर्फ उसी रात
नींद मेरी आँखों में बसती है
मेरे नहीं
मेरे दम के हमदम
तुम्‍हें और तुम्‍हारे शहर को
जब तरस आती है
तब कोई छोटी सी बदली
मुझ पर भी बरस जाती है।
तुम्‍हारे शहर की बात
मेरी राहों में विखरी है
देखो
आधी रात की फटी-फटी चाँदनी

कैसी निखरी है
मैं एक-एक को चुन रहा हूँ
इस ठंडी तपन में
उलट-पुलट भुन रहा हूँ
तुम्‍हारा शहर
अब किसी दिन मुझे निकाल देगा
ऐसा सुन रहा हूँ।


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