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कविता

शापित कमलों का आत्म-मंथन
कन्हैयालाल नंदन


गंध की पंखुरियों पर
 
बूँदों का पहरा
अंतर का तरलायित दर्द
बिखर
ठहरा।
झिलमिल-सी ज़िंदगी है ये ठहरा जल
सत्य के झरोखों से
झाँक रहा छल।

इंद्रधनुष-सा भविष्य
दे दिया जनम ने।
आलस के बीच-मंत्र
सिद्ध किए
हमने।
शेखियाँ बघारते गई उमर निकल,
ललक रहे बोये बिन
काटने फसल।

चटख-चटख रंगों में
ज़िंदगी नई।
मुट्ठी भर रोशनी
सही नहीं गई,
लंगड़ाती ताबों का अगुआ
हर दल।
आस के धुँधलकों की
धारा अविरल।

मुट्ठियाँ हवाओं में
तान-तान सोचा
हाय कुछ न आया
तो खालीपन नोचा।
सिसिफस का शाप जिया करते
हर पल!
इसी तरह मुरझ गए
शतदली कमल!

सृजन का दर्द

अजब सी छटपटाहट,
घुटन,कसकन ,है असह पीङा
समझ लो
साधना की अवधि पूरी है

अरे घबरा न मन
चुपचाप सहता जा
सृजन में दर्द का होना जरूरी है

 

 


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