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कविता

धूप चढ़ी
प्रेमशंकर मिश्र


धूप चढ़ी
धीरे-धीरे
टूटी मेहरबोनों में
झूलती अबाबीलें
सरकाने लगीं
छाया तीरे, धूप चढ़ी...।
इधर कुछ दिनों से मन
नित तिल तिल गलता है
धुएँ का वजन ढोते प्राण
खंड खंड टूटता मकान
साँस साँस, सीरे सीरे, धूप चढ़ी
झाँझर के बोल
छाजन के टूटे बंधन
जालों में बुने हुए एक
ऊपर सदियाँ
नीचे मौसम की टेक।
माटी माटी नीरे नीरे... धूप चढ़ी... ।
फूलों आँखों
झूली पाँखें पर
पग पग फागुन
बरन बरन की उमरों की।
तीखी धुन।
रूख रूखद्य ढाँपती मजीरें
धूप चढ़ी
धीरे धीरे।


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