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कविता

अंतिम अश्रु
अरुण कोलटकर
संपादन - निशिकांत ठकार


सारी गंदगी निकल जाने दे
अपनी आँखों से
सारी गौलक्षियाँ, नालियाँ गधे
गंधर्वनगरियाँ गीध
देवता, दानव, हिंदू औ' मुसलमान
सुंता हुए और बेसुंते लौंडे व
जन्नते दोजखे मसीहा चूहे
वारांगनाएँ तारांगन सारे
सवा लाख भुनगे
डेढ़ लाख भड़घए औ' नौ लाख भड़भूँजे
खानाजंगी बंधुकलह महाभारत क्रूसेड जिहाद सगरे
कसमसाते शहर
हनुमानचालीसा एकी संतेचालीसा
यहाँ के बारह लौंडोवाले सर्वपल्ली बम व ब्रह्मास्त्र
खोपड़ियों के टीले रचनेवाले चैंगीज़खान तैमूरलंग नादिरशाह
अपनी तिरसठ बीवियों की बिजन करनेवाले अफ़जलखान
यहाँ के यातनाशिविर मासग्रेव लाश ढेर गैस चेंबर
यहाँ के वंशच्छेद सर्पसत्र फायनल सोल्यूशन एश्निक क्लेंजिंग
रायट, कत्ल
इक्कीस बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय बना याकि
निर्ज्यू निष्कनानी निर्हुर्त्तु निर्तुत्सी निर्बुद्ध निर्मूर्तिपूजक
निरिंका निरैजटैक निर्रेडइंडियन निर्हिन्दु निर्मुसलमान बना
विशुद्ध द्वेष के कुंड में हाथ धोकर मुक्त होनेवाले परशुराम


यहाँ के धर्म यहाँ की जातियाँ व उपजातियाँ
युगोयुगों तक रिसते रहनेवाले मानसिक जख्म और अस्मिताएँ
गैंग्रीनग्रस्त
यहाँ के पंडे मुल्ला पुजारी पाद्री शंकराचार्य रब्बी लामा पोप खलीफा
यक्ष किन्नर गंधर्व राक्षस देव दैत्य असुर ब्रह्मराक्षस बरुवे बैताल
पलंबर व इलैक्ट्रीशियन
ग्यारह रुद्र चौदह मनु अट्ठाईस व्यास
अट्ठासी हजार ऊर्ध्वरेता
छत्तीस हजार तीन सौ तैंतीस देवता चंद्रपान करनेवाले
यहाँ की गुंडाशाहियाँ भीड़शाहियाँ दमनशाहियाँ मारपीटशाहियाँ
यहाँ के सीजर यहाँ के चक्रवर्ती यहाँ के फ्यूरर यहाँ के
अश्वत्थामा व ऐखमन
डगमगानेवाले इंद्र यहाँ के
हजार हाथों से रिश्वत लेनेवाले सहस्रार्जुन
ग्यारह सिरोंवाले वितंडावादी अवलोकितेश्वर
और दाहिनी सूँड़वाले कवि


यह सारी गंदगी बह जाएगी
तेरी आँखों से
तब विशुद्ध अश्रु
मात्र एक ही
बचा रह जाएगा अंत में
उसे बस सँभालकर रखना आँख में


वही काम आएगा
फिर नए सिरे से सृष्टि का
निर्माण करने

अरी
विश्वात्मके


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