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कविता

जाल, मछलियाँ और औरतें
अच्युतानंद मिश्र


 

वह जो दूर गाँव के सिवान पर
पोखर की भीड़ पर
धब्बे की तरह लगातार
हरकत में दिख रहा है
वह मल्लाह टोल है

वहीं जहाँ खुले में
जाल मछलियाँ और औरतें
सूख रहीं हैं
आहिस्ते-आहिस्ते वे छोड़ रहीं हैं
अपने भीतर का जल-कण

मछलियों में देर तक
भरा जाता है नून
एक एक कर जाल में
लगाए जाते हैं पैबंद
घुँघरुओं की आवाज सुनकर
नून सनी मछलियाँ काँप जाती हैं

मछुवारिने जाल बुनती हैं

पानी की आवाज देर तक
सुनते हैं लोग और
पानी के जगने से पहले
औरतें पोंछ लेती है पानी
पानी के अंधकार में वे दुहराती हैं प्रार्थना
हे जल हमें जीवन दो

फिर उसे उलट देती हैं
हे जीवन हमें जल दो

मछलियाँ बेसुध पड़ी हैं नींद में
मछुवारों के पैरों की धमक
सुनती हैं वे नींद में
नींद जो कि बरसात की बूँदों की तरह
बूँद-बूँद रिस रही है

बूँद-बूँद घटता है जीवन
बूँद-बूँद जीती हैं मछुवारिने
कौन पुकारता है नींद में
ये किसकी आवाज है
जो खींचती है समूचा बदन
क्या ये आखिरी आवाज है
इतना सन्नाटा क्यों है पृथ्वी पर ?

घन-घन-घन गरजते हैं मेघ
झिर-झिर-झिर गिरती हैं बूँदें
देर तक हाँड़ी में उबलता हैं पानी
देर तक उसमे झाँकती है मछुवारिने
देर तक सिझतें हैं उनके चेहरे

मछलियों के इंतजार में बच्चे रो रहे हैं
मछलियों के इंतजार में खुले है दरवाजे
मछलियों के इंतजार में चूल्हों से उठता हैं धुआँ
मछलियों के इंतजार में गुमसुम बैठी हैं औरतें

मल्लाह देखतें हैं पानी का रंग
जाल फेंकने से पहले काँपती है नाव

मल्लाह गीत गाते हैं
वे उचारते हैं
मछलियाँ मछलियाँ, मछलियाँ

उबलते पानी में कूद जाती हैं औरतें
वे चीखतीं हैं
मछलियाँ, मछलियाँ, मछलियाँ
बच्चे नींद में लुढ़क जाते हैं
तोतली आवाज में कहते हैं
मतलियाँ मतलियाँ मतलियाँ

उठती है लहर
कंठ में चुभता है शूल
जाल समेटा जा रहा है
तड़प रही हैं मछलियाँ
उनके गलफर खुले हैं
वे आखिरी बार कहती हैं मछलियाँ
मल्लाहों के उल्लास में दब जाती है
यह आखिरी आवाज


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