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कविता

नींद
जितेंद्र श्रीवास्तव


एक अकेले कमरे में
नींद अकेली दिखती है अक्सर
पर
कितनी चीजें और वहाँ होती हैं
भीतर-बाहर
मन के तन के

देखो तो नींद
वस्त्र है झीना-सा
दीखता है
पार दृश्य भी उसके

देखो तो कैसे मन
नींद में धीरे-धीरे
अर्जित करता है ऊष्मा
धीरे-धीरे हटाती हैं सलवटें आत्मा की

धीरे धीरे नींद करती है मुक्त
प्रेम-सी।


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