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कविता

स्मृतियाँ
जितेंद्र श्रीवास्तव


स्मृतियाँ सूने पड़े घर की तरह होती हैं
लगता है जैसे
बीत गया है सब कुछ

पर बीतता नहीं है कुछ भी

आदमी जब तैर रहा होता है
अपने वर्तमान के समुद्र में
अचानक स्मृतियों का ज्वार आता है
कुछ समय के लिए
और सब कुछ बदल देता है

अचानक बेमानी लगने लगता है
तब तक सबसे अर्थवान लगने वाला प्रसंग
और जिसे हम छोड़ आए होते हैं
बहुत पीछे अप्रासंगिक समझकर
वह जीवन की तरह मूल्यवान लगने लगता है

बहुत से संबंध और बहुत से मित्र
जो छूट गए होते हैं आँकड़ों की गणित में
अचानक किसी दिन सिरहाने खड़े मिलते हैं

कुछ चिट्ठियाँ निकलती हैं पुराने बक्सों से
और बंद पडी आलमारियों से
और उनमें लिखी तहरीरें
दिखा जाती हैं आईना

बीता हुआ कल
वहीं दुबका बैठा मिलता है
कभी हाथ मिलाने को बढ़ आता है उत्सुक
कभी छुपा लेता है नजरें
कुछ लोगों को लगता है
जैसे स्मृतियाँ पीछे खींच ले जाती हैं हमें
लेकिन ऐसा होता नहीं है
स्मृतियाँ अक्सर तब आती हैं
जब सूख रहा होता है
अंतर का कोई कोना
सूखे के उस मौसम में
वे आती हैं बरखा की तरह
और चली जाती हैं
मन-उपवन को सींच कर


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