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कविता

धीरे से कहती थी नानी
जितेंद्र श्रीवास्तव


मिलने से घटती हैं दूरियाँ
आने-जाने से बढ़ता है प्यार
शरमाने से बचती हैं भावनाएँ
चलने से बनती है राह

जूझना सीखो बेटा! जूझना
जूझने से खत्म होती हैं रुकावटें
कभी-कभी मेरा माथा सहलाते हुए
धीरे से कहती थीं नानी।


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