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कविता

प्रकृति बचाती रहेगी पृथ्वी को निस्वप्न होने से
जितेंद्र श्रीवास्तव


नीले समुद्र पर
बिखरी है चादर नमक की
चेहरा ज्यों पहचाना-सा कोई

इस समय भीड़ में अकेला
दृश्य में डूबा ढूँढ़ता तल अतल तक कुछ
पहचानने की कोशिश में हूँ कालिदास के मेघ को

युग बीते कितने
बीते पुरखे कितने
टिका नहीं यौवन जीवन किसी का
पर मेघ अभी जस का तस
अब भी उत्सुक बनने को दूत

यह चमत्कार देख
भीतर कहीं से उठती है आवाज
बीत जाएँ मनुष्य यदि किसी दिन
नहीं बीतेंगे स्वप्न उनके साथ

प्रकृति की समूची देह
धीरे से
बदल जाएगी स्वप्न में उस दिन

धरती पर मनुष्य
बचें न बचें
प्रकृति बचाती रहेगी पृथ्वी को
निस्वप्न होने से।

 


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