डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

यात्रावृत्त

खोलो राज वरना पिटो बंधु : छुनछन की रुनझुन
दिविक रमेश


कोरिया में आने का मूल मकसद तो था हिंदी पढ़ाना और वह मैं निष्ठा के साथ पढ़ा भी रहा था, लेकिन मन में कोरियाई साहित्य, कलाओं, जन-जीवन, संस्कृति आदि जानने की ललक भी कम न थी। अपनी आँखों से कोरिया का चप्पा-चप्पा देख लेना चाहता था। असल में मेरे मन में एक बात यह भी बैठ गई थी कि यदि मुझे कोरियाई साहित्य का हिंदी में अनुवाद करना है तो कोरिया के जन-जीवन, संस्कृति आदि को गहराई और समीप से जानना होगा। भाषा सीखने से भी ज्यादा मुझे यह काम अधिक जरूरी लग रहा था। समय की कमी तो थी नहीं। देश भी कोई बहुत बड़ा नहीं। इस काम में मेरी विशेष मदद मेरे एक प्रिय विद्यार्थी किम छंग योंग ने भरपूर की। उसने 6 नवंबर, 1994 को, रविवार होने के कारण, कोरिया के पूर्व-उत्तरी भाग में बसे एक सुंदर शहर छुनछन (Chunchun or Chuncheon) को देखने का कार्यक्रम बनाया। छुनछन कोरिया के गांगवॉन (Gangwon) राज्य का प्रमुख शहर है। मैं तो ऐसे कार्यक्रमों के लिए जैसे बिस्तर बांध कर ही बैठा रहता था। तुरंत हामी भर दी। छंग योंग ने बता दिया था कि छुनछन में सोल से ज्यादा ठंड होती है, अतः मैंने इस सूचना के अनुसार कपड़ों की तैयारी कर ली थी। उसने यह भी बताया कि वहाँ के लोग प्रायः शर्मीले हैं क्योंकि वह शहर सोल की तरह अत्याधुनिक नहीं है। उसे वहाँ अपनी दोस्त से भी मिलना था। कोरियाई भाषा में दोस्त और प्रेमिका के लिए अलग-अलग शब्द हैं - क्रमशः चिंगू और ऐइन। सोल में दोस्त के साथ भी जिस तरह के खुलेपन के साथ मिला जाता है उसे देखकर भारतीय आदमी तो प्रेमिका ही समझने की भूल कर लेगा।

किम ने बताया की रेल से डेढ़ घंटे का सफर है लेकिन रेल की तमाम सीटें बिक चुकी हैं अतः बस से जाना होगा। रेल में तो खड़े होकर ही जाया जा सकता है। उसने कारण बताया कि सप्ताहांत पर यहाँ से अनेक जोड़े (लड़के-लड़कियाँ) वहाँ जाते हैं क्योंकि एक ही दिन में, जाकर वापस लौटा जा सकता है। एक ओर का रास्ता भी मात्र डेढ़ घंटे का है और स्थान भी साफ-सुथरा और शांत है। मैं चाह रहा था कि किम और ज्यादा नहीं बताए क्योंकि मैं सब कुछ का साक्षात अनुभव कर लेना चाहता था। खैर, हम बस से सोंगबोंग (Songbong) बस अड्डे पर पहुँच गए जहाँ से आगे की बस मिलनी थी। सुबह के 9.55 पर बस मिल गई। बस में आगे की सीट ली। किम ने पहले ही संकेत दे दिया था कि टिकिट पर 3300 वॉन खरचने होंगे। ठीक भी था। वह तो अभी विद्यार्थी ही था सो पैसा मुझे ही देना था। किम ने पाया कि हमें मिली सीटों पर दो आदमी (पति-पत्नी) बैठे थे। किम ने टिकिट दिखाते हुए उनसे उठने का अनुरोध किया तो वे आराम से उठ कर चले गए। किम ने बताया कि उसे अगली सीट ही पसंद है क्योंकि वहाँ से सब कुछ आसानी से देखने को मिलता है। उसने यह भी पहले ही बता दिया कि सड़क की दाईं ओर नदी, पहाड़ और स्वच्छ हरियाली देखना न भूलूँ। नदी का नाम सोयंग नदी था जो कि सोल की ही नदी के उत्तरी भाग का नाम था जिसका अन्य नाम बुक (उत्तरी) हन कांग (Puck Han River) भी था।

सोल में संकेत-सूचकों का रंग भी अलग-अलग पाया था। नीले रंग की पट्टी सोल स्थित स्थान की सूचक थी तो सोल की हद से बाहर के स्थान के लिए हरे रंग की पट्टी थी। लगभग 10 मिनिट में ही हम ग्योंगी (Gyounggi) राज्य में प्रवेश कर गए थे और उसके कुछ ही देर बाद अर्थात 10-15 मिनिटों में हम गांगवॉन राज्य में थे। पहला शहर मिग्युम था। मैंने पाया कि शहर और राज्य एक दूसरे से ऐसे जुड़े हें कि सीमा का एहसास ही नहीं होता। न पुलिस ही अलग दिखती है और न अवरोध ही। किम ने संकेत से एक संख्या दिखाई - 9251 और बताया कि इस प्रकार के नंबर जगह-जगह मिलेंगे जिनका अर्थ है - कोरियाई मिलट्री कैंप क्योंकि उत्तरी कोरिया से इस भाग को निरंतर खतरा बना रहता है।

रास्ते में पीयर्स (नाक) के बाग भी खूब देखने को मिले। वैसे ऐसे बाग मैं पहले भी देख चुका था। विशेष रूप से फल से पहले जब फूल आते हैं तो लदे हुए फूलों के उमड़े समुद्र को देखने का आनंद अद्वितीय होता है। लगभग 35 मिनिट के सफर के बाद खेत-खलिहानों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी थी। फसलें कट चुकी थीं। हाँ खेतों में सब्जियाँ जरूर स्वागत कर रही थीं - कहीं-कहीं तो तिरपालनुमा घरों में से झाँकती हुई भी। यह स्थान मिग्युन शहर के दो भागों के बीच का था। और सामने था मिग्युन का 'सिटी हॉल' था - तितली के आकार का एक आधुनिक सुंदर भवन। किम ने बताया कि यह शालीनतापूर्ण उड़ान भरने का प्रतीक है। देख और सुन कर एक बहुत ही अलग ढंग का अनुभव हुआ था - कुछ-कुछ अलौकिक सा। खेती-बाड़ी, फलों के बागों, खाली स्थान, हरियाली, पेड़ों और पहाड़ से भरा वह दृश्य कहीं भीतर तक उतरता चला जा रहा था - ध्यान की ओर ले जाता हुआ।

अब हम अपने गंतव्य के और निकट पहुँच गए थे। किम ने बताया कि छुनछन में कोरिया का सबसे बड़ा बाँध छुनछन में ही है लेकिन उसे इस बार नहीं देखा पाएँगे। दूसरे स्थान पर किसी स्थल की जानकारी होने पर भी न देख पाने का जो मलाल होता है वह मुझे भी हुआ। अच्छा यह है कि मनु्ष्य ऐसे अभावों की पूर्ति अक्सर 'अगली बार' के खाते में डाल कर, कर लिया करता है। पेड़ों पर पत्ते कुछ कमजोर और पीले लग रहे थे। थोड़े हरे भी बचे हुए थे लेकिन सहमे-डरे से। आत्म बलि देने की सी मुद्रा में। नन्हें-नन्हें पेड़ भी मानो देखा-देखी अपने बुजुर्गों की राह पर चल रहे थे। पता चला कि बर्फ गिरने की तैयारी में था वह सब। अद्भुत! केसरी, हरे और पीले वस्त्र धारण किए हुए पहाड़ कितने शांत लग रहे थे - सर्दी में लंबी समाधि के लिए तैयार होते हुए साधु! रास्ते में आई मसॉक सुरंग। अरे बाप रे सुरंग थी या सुरसा का मुँह। पूरी 276 मीटर लंबी। मोटल दिखा तो लगा वहाँ का आनंद ले लिया जाए, लेकिन कार होती तो रुक सकते थे।

हम तो बस में थे। सड़क के साथा-साथ रेल की पटरी भी दिखने लगी थी - लुका-छिपी करती हुई। नदी के पास एक विशेष स्थान को दिखाते हुए किम ने बताया कि वहाँ एम.टी. अर्थात सदस्य-प्रशिक्षण के लिए सोल से लड़के आते हैं - जब भी कोई क्लब बनाना हो। विचार-विमर्श करते हैं। इस काम के लिए कोरिया की वह प्रसिद्ध जगह थी। कितना साफ और प्रदूषण रहित स्थान था वह - एकदम तरोताजा! नदी का पाट बहुत चौड़ा तो नहीं था लेकिन किसी युवती सा एकदम गदराया हुआ जरूर था - एकदम साफ नीला-लहरदार आँचल ओढ़े हुए। पहाड़ के चरण धोते हुए। सोल की प्यास भी तो बुझाती हे यह नदी। और वह नन्हा सा गाँव - छोटी-छोटी ढकवाँ छतों वाले एक मंजिले घर!

मेरी निगाह गई तो देखा कि बस में आगे की ओर प्रार्थना करता हुआ चित्र लगा था। तभी एक 'चेक पाइंट' (सुरक्षा चौकी) आया तो किम ने झट बताया कि उत्तरी भाग में काफी 'चेक पाइंट' हैं, लेकिन कोई रोका-टोकी नहीं है। अचानक मुझे पंक्तियां सूझीं -

'हमारी रक्षा करते हैं पहाड़ / और पहाड़ों की?', लेकिन मन ही मन। मजा बहुत आ रहा था। खासकर बार-बार छोटे-छोटे गाँवों के आगमन से। कहीं-कहीं धुआँ उठ रहा था। कटी हुई फसलों के गट्ठर नजर आ रहे थे। औरतें काम कर रही थीं। लोग मशीन पर चावल-भूसी अलग कर रहे थे। छोटे-छोटे बूंगे भी दिखे। दूर-दूर तक मूली के खेत थे। असल में तो मिट्टी के दर्शन हो रहे थे, उसकी महक के साथ। सोल की पीछे-पीछे छूट चुकी बड़ी-चौड़ी सड़कों और चमकती हुई चकाचौंध को कब का नमस्कार कर चुका था। कहीं रेला-पेला नहीं था। कोई भीड़-भड़क्का नहीं।

यहाँ तो पगडंडियाँ किसी चित्रकार की कला नजर आ रही थीं। हर ओर से आत्मीयता की मानो धीमी-धीमी वर्षा हो रही थी। और उस पुल के बारे में तो बताया ही नहीं जिसने ग्योंगी और गांगवॉन राज्यों को अलग किया हुआ था। पता चला कि पहले गांगवॉन राज्य नहीं था।

कच्चे रास्ते, गाँव और नदी कभी दिखते कभी लुप्त हो जाते, लेकिन 'हाई वे' मजबूत और सुंदर था। नदी में छोटी-छोटी मोटर-नावें चल रही थीं। चप्पू से चलनी वाली नावें भी दिखीं। कुछ विदेशियों को मछली पकड़ते हुए भी देखा। असल में हम छुनछुन शहर पहुँच चुके थे।

शहर में घुसते ही भ्रमणकारियों के ठहरने के लिए कितने ही स्थान दिखे। शुरू-शुरू में थोड़ा उजड़ापन लगा लेकिन लगभग 10 मिनिट के बाद हम शहर में थे। छुनछुन नदियों और पहाड़ों के लिए प्रसिद्ध है और इसका अनुभवानंद मैं ले रहा था। सोयंग झील का नजारा भी देखा हालाँकि 1973 में बँधा बाँध नहीं देख पाया। झील में नौका विहार की सुविधा भी थी। पर पानी देखने के लिए मैं जितना लालायित रहता हूँ उतना ही उसमें घुसने से डर लगता है। पहाड़ खूबसूरत तो थे ही साथ ही कितने ही कोरियाई परिवारों के लिए आजीविका के साधन भी हैं, यह भी अपनी आँखों देखा। मैंने देखा कितनी ही महिलाएँ पहाड़ों से तोड़कर लाई गयीं सब्जियाँ आदि बेच रही थीं। कोरिया में जगह-जगह स्मारक भी देखे जा सकते हैं। यहाँ इथोपिया भवन के रूप में स्मारक था। जापान-युद्ध में इथोपिया ने कोरिया की मदद की थी उसी की याद में वह स्मारक था। हाँ, किम छंग योंग की मित्र (किम इयुन) भी तो अपनी एक मित्र (मिस उन) के साथ हमारे साथ ही थी। दोनों ही प्राइमरी स्कूल में पढ़ा रही थीं।

छुनछन आएँ और म्योंगदोंग (बता दूँ कि सोल में भी आधुनिक तर्ज पर बना एक बहुत बड़ा बाजार है जिसके स्थान का नाम म्योंगदोंग है) में कोरियाई भोजन न खाया जाए तो समझो छुनछन का आधा ही आनंद लिया। ऐसा कहना किम का था और मैंने पाया उसका कहना एकदम ठीक था। मांसाहारी 'टक कल्बी' का अद्वितीय लुत्फ उठा सकते हैं। वहाँ के ठंडे नूडल्स भी बहुत माशित्टा (स्वादिष्ट) होते हैं। इस बीच मैंने कितने ही कोरियाई शब्द सीख लिए थे, जैसे दीजिए के लिए चुसयो, लीजिए के लिए टिसेयो, बहुत के लिए मेऊ, क्षमा के लिए मीएन हमनिदा, सुंदर के लिए आरमधप सुम निदा, पु्रुष को बुलाने के लिए अदीशी, शादीशुदा महिला के लिए अजुंमा, स्त्री के लिए अगीशा और बच्चे को बुलाने के लिए कामाया इत्यादि।

और अब बारी उस अनुभव की है जिसे न किया होता तो शायद छुनछन की याद कभी की उड़ चुकी होती। यह अनुभव था विवाहोपरांत निभाए जाने वाले एक पारंपरिक रिवाज का। घूमते-घामते हम एक पार्क में निकल आए थे। नहीं जानता कि किम छंग योंग जान-बूझकर वहाँ लाया था अथवा संयोग से उधर आ गए थे। हम ने देखा कि वहाँ नवदंपति और उनके स्त्री-पुरुष मित्र एकत्रित थे। नवविवाहित पति की एक टाँग को सफेद रंग के थोड़े लंबे रस्सीनुमा कपड़े से बांध रखा था। किम ने बताया कि वह एक पुरानी परंपरा थी जिसे नव विवाहितों के प्रायः हनीमून पर जाने से पहले निभाया जाता है - मित्रों के बीच। मैंने देखा कि कोरियाई भाषा में दोस्तों ने नविवाहिता से कुछ पूछा। नहीं जान पाया कि क्या पूछा लेकिन उसके सकुचा जाने और शर्मा जाने से अनुमान लगाया कि कोई परेशान करने वाला प्रश्न पूछा गया था। उत्तर न मिलने पर मित्रों के द्वारा पति की टाँग से बंधे कपड़े को खींच लिया गया उसके गिरने पर उसे डंडों से पीटा जाने लगा। दो-तीन मित्रों ने उसे पकड़ भी रखा था। शायद इसलिए कि कहीं भाग न जाए। मैं तो भौंचक्का रह गया। किम की ओर देखा तो उसने थोड़ा शर्माते हुए बताया कि मित्रों ने पत्नी से उन दोनों के बीच के यौन संबंधों के बारे में पूछा था तो पत्नी की ओर से उत्तर न मिलने पर पति को पीटा गया और उसे तभी छोड़ा गया जब पत्नी ने उत्तर दिया। यह भी बताया कि पहले सूखी मछली से पीटा जाता था लेकिन आजकल डंडों से पीटा जाता है। किम ने थोड़ा संकोच से उबर कर बताया कि पत्नी से पूछा गया था कि पति ने पिछली रात में कहाँ-कहाँ छुआ था अर्थात बैडरूम की गोपनीय बातें बतानी पड़ती है, इत्यादि। कभी-कभी पत्नी को पति की एक टाँग में अंडा डाल कर दूसरी टाँग से निकालने को कहा जाता है। गाना और नाचना भी पड़ता है। जो दोस्त चाहते हैं वह सब करना पड़ता है - चूमना भी पड़ता है। गोद में उठाना पड़ता है। सच तो यह है कि हम यह सब होते हुए देख भी रहे थे। एक प्रश्न को सुनकर किम ने कहा कि उसे वह नहीं बता सकता क्योंकि वह अश्लील है। दोस्तों का सारा खर्चा पति को करना होता है। यानी परेशान भी हो, पिटाई भी खाओ और पैसे भी खर्च करो। यह एक प्रकार की रेगिंग करने और मौजमस्ती का लुत्फ उठाने की परंपरा लगी। मैंने निष्कर्ष निकाला कि शायद इस परंपरा का मकसद पति-पत्नी को एक-दूसरे से घुलने-मिलने का अवसर देना, पत्नी की धैर्य की परीक्षा लेना और पति के प्रति उसके सरोकारों की थाह लेना था। मुझे याद आया कि इधर उत्तर भारत में गाँव-देहात में औरतें नवदंपति को गाँव के बाहर किसी पेड़ के नीचे ले जाकर कमचियों (लकड़ी) या कोड़े मारने का खेल खिलाया जाता है लेकिन वह कई मामलों में कोरिया खेल से अलग होता है। जर्मनी में मैंने पति-पत्नी को आरा चलाने की परंपरा निभाते देखा था। जो भी हो छुनछुन ने अद्भुत अनुभव कराया था।

वापस बस ही सोल लौटना था। स्थानीय बस से, सोल के लिए मिलने वाली बस के अड्डे तक आना था। किम की मित्र और दूसरी लड़की हमारे साथ थी। दोनों लड़कियाँ बहुत ही भली और ग्रामीण संस्कृति की थीं। रास्ते के लिए कुछ फल और मिनरल पानी की बोतल लाकर दे दी थीं। उनकी आँखों में बहुत ही आत्मीयता का भाव था और वे एक खास प्रकार के विनम्र जल से भीगी हुईं थीं।उस विदा-वेला में किम छंग योंग का चेहरा भी बहुत उदास और उतरा हुआ लग रहा था। उसका बार-बार यह कहना कि वह छुनछन में ही रहना चाहता है, सोल में नहीं, उसके मन को व्यक्त कर रहा था। मैंने भी किम और मिस किम को जान-बूझकर काफी एकांत दिया था। इस व्यवहार से किम बहुत खुश और कृतज्ञ लग रहा था। !

सोल में मैं और किम छंग योंग एक बार फोर सॉगबांग बस टर्मिनल पर पहुँच चुके थे। रात का अँधेरा हो चुका था। घर के लिए टैक्सी ली। थोड़ी ही देर बाद मुझे लगा कि टैक्सीवाला शायद लंबे रास्ते से जा रहा था। मीटर में पैसा भी बढ़ता जा रहा था। मैंने किम से यह बात कही। वह ठहरा थोड़ा संकोची। उसने इतना भर कहा यह शायद ज्यादा पैसा बनाना चहता है। कोरिया में टैक्सी वाले ऐसे होते तो नहीं। मैंने कहा कि यह ईमानदार नहीं है। पता नहीं टैक्सी वाले ने सुना और समझ था कि नहीं। कुछ देर बाद किम ने संकोच छोड़कर टैक्सी वाले से लंबे रास्ते वाली बात पूछ ली। टैक्सी वाला जैसे चौंक गया। चौंक तो हम भी गए - टैक्सी वाले का जवाब सुनकर। उसने हमारा बताया गंतव्य गलत समझ लिया था और इसीलिए दूसरी दिशा में चल पड़ा था। उसने बहुत ही अफसोस जाहिर किया। अपनी भूल के कारण हुए हमारे समय की बर्बादी के लिए बार-बार माफी माँगने लगा। खैर हम घर पहुँचे। मीटर में 6000 वॉन आए थे जो बस अड्डे से वहाँ तक की दूरी के लिए बहुत ज्यादा थे। लेकिन हमें तो एक बार फिर चौंकना था। मुझे तो इसलिए और भी ज्यादा कि मैं भारतीय परिवेश का जानकार भारतीय था। टैक्सी वाले ने मात्र 2000 वॉन लिए जो उचित किराए से भी 400 वॉन कम थे। 400 वॉन कम लेकर शायद उसने अपनी भूल का प्रायश्चित किया था। मैं भीतर ही भीतर बहुत लज्जित महसूस कर रहा था। अपने आप पर ग्लानि हो रही थी। कितना गलत कहा था मैंने कि यह ईमानदार नहीं है। कोरिया में अब तक लोगों ने मेरी मदद ही की थी। कभी धोखा खाने का तो कोई अनुभव था ही नहीं।

किम बस लेकर अपने घर चला गया। एक घंटे बाद अपने घर पहुँचेगा। बिस्तर पर जाने से पहले मैंने इतना जरूर कहा (भले ही वहाँ कोई सुनने वाला नहीं था) -धन्यवाद किम छंग योंग! धन्यवाद मिस किम छंग योंग! धन्यवाद मिस किम इयुन! धन्यवाद मिस उन! और छुनछन में नवदंपति वाले अनुभव की याद में मुस्कुराते हुए बिस्तर पर लेट गया।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में दिविक रमेश की रचनाएँ