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कविता

तमकुही कोठी का मैदान
जितेंद्र श्रीवास्तव


तमकुही कोठी निशानी होती
महज सामंतवाद की
तो निश्चित तौर पर मैं उसे याद नहीं करता

यदि वह महज आकांक्षा होती
अतृप्त दिनों में अघाए दिनों की
तो यकीनन मैं उसे याद नहीं करता

मैं उसे इसलिए भी याद नहीं करना चाहता
कि उसके खुले मैदान में खोई थी प्राणों सी प्यारी मेरी साइकिल
सन उन्नीस सौ नवासी की एक हंगामेदार राजनीतिक सभा में

लेकिन मैं उस सभा को नहीं भूलना चाहता
मैं उस जैसी तमाम सभाओं को नहीं भूलना चाहता
जिनमें एक साथ खड़े हो सकते थे हजारों पैर
जुड़ सकते थे हजारों कंधे
एक साथ निकल सकती थीं हजारों आवाजें
बदल सकती थीं सरकारें
कुछ हद तक ही सही
पस्त हो सकते थे निजामों के मंसूबे

मैं जिस तरह नहीं भूल सकता अपना शहर
उसी तरह नहीं भूल सकता
तमकुही कोठी का मैदान

वह सामंतवाद की कैद से निकलकर
कब जनतंत्र का पहरुआ बन गया
शायद उसे भी पता न चला

ठीक-ठीक कोई नहीं जानता
किस दिन शहर की पहचान में बदल गया वह मैदान
न जाने कितनी सभाएँ हुईं वहाँ

न जाने किन-किन लोगों ने कीं वहाँ रैलियाँ
वह जंतर-मंतर था अपने शहर में

आपके शहर में भी होगा या रहा होगा
कोई न कोई तमकुही कोठी का मैदान
एक जंतर-मंतर

सायास हरा दिए गए लोगों का आक्रोश
वहीं आकार लेता होगा
वहीं रंग पाता होगा अपनी पसंद का

मेरे शहर में
जिलाधिकारी की नाक के ठीक नीचे
इसी मैदान में
रचा जाता था प्रतिरोध का सौंदर्यशास्त्र

वह जमीन जो ऐशगाह थी कभी सामंतों की
धन्य-धन्य होती थी
किसानों-मजूरों की चरण धूलि पाकर

समय बदलने का
एक जीवंत प्रतीक था तमकुही कोठी का मैदान
लेकिन समय फिर बदल गया
सामंतों ने फिर चोला बदल लिया

अब नामोनिशान तक नहीं है मैदान का
वहाँ कोठियाँ हैं फ्लैट्स हैं
अब आम आदमी वहीं बगल की सड़क से
धीरे से निकल जाता है
उस ओर
जहाँ कचहरी है

और अब आपको क्या बताना
आप तो जानते ही हैं
जनतंत्र में कचहरी मृगतृष्णा गरीब की।


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